03जेएनडी10: कथा में रुक्मिणी विवाह की झांकी प्रस्तुत करते बच्चे। स्रोत: आयोजक
सफीदों। पितृ पक्ष के अवसर पर श्री कृष्ण भक्ति भागवत समिति की ओर से ऐतिहासिक नागक्षेत्र सरोवर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का श्रवण कर भावविभोर हो रहे हैं।
कथा व्यास पीठाधीश्वर परम स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने शनिवार को कहा कि भागवत केवल कथा सुनने का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य को भगवान के प्रति विश्वास, भक्ति और समर्पण का मार्ग दिखाने वाला ग्रंथ है।
उन्होंने रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि महाराज भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को मन ही मन अपना पति स्वीकार कर लिया था। हालांकि उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण तक अपना संदेश पहुंचाया। उनकी पुकार पर श्रीकृष्ण कुण्डिनपुर पहुंचे और रुक्मिणी को अपने साथ ले आए। बाद में दोनों का विधि-विधान से विवाह हुआ।
स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती ने कहा कि रुक्मिणी का प्रसंग सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई प्रार्थना व्यक्ति को भगवान की शरण तक पहुंचाती है। इसके बाद उन्होंने स्यमंतक मणि की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि मणि को लेकर भगवान श्रीकृष्ण पर लगे आरोप को दूर करने के लिए वे स्वयं सत्य की तलाश में निकले।
इसी क्रम में उनका सामना जामवंत से हुआ। लंबे संघर्ष के बाद जामवंत ने श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया और उन्हें भगवान राम के रूप में दर्शन देने की प्रार्थना की।
भगवान ने उनकी इच्छा पूरी की। इसके बाद जामवंत ने अपनी पुत्री जामवती और स्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को अर्पित कर दी। कथा व्यास ने कहा कि स्यमंतक मणि प्रसंग यह संदेश देता है कि सत्य अंततः सामने आता है। मनुष्य को अहंकार छोड़कर प्रभु की शरण ग्रहण करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान का नाम स्मरण और भक्ति मन को शांति प्रदान करती है तथा जीवन को सही दिशा देती है।