जींद। जब अस्पताल की नर्स ने बेटी के जन्म पर मिठाई के पैसे लेने से इनकार किया तो पिता सुनील जागलान ने वहीं से ठान लिया कि समाज की सोच बदलनी है। यही शुरुआत थी एक ऐसे अभियान की जो आज सेल्फी विद डॉटर के रूप में न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के 70 देशों में बेटियों को सम्मान दिलाने का जरिया बन चुका है।
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस की पूर्व संध्या पर जिले के बीबीपुर गांव निवासी व सामाजिक कार्यकर्ता प्रो. सुनील जागलान की कहानी एक प्रेरणास्रोत बनकर सामने आती है। 24 जनवरी 2012 को बेटी नंदिनी के जन्म के बाद अस्पताल में जब नर्स ने कहा कि अगर बेटा होता तो मिठाई के पैसे लेते, तब सुनील के मन को गहरी ठेस पहुंची। उसी क्षण उन्होंने बेटियों के लिए समाज की सोच बदलने की ठानी।
इसके बाद बेटी बचाओ, महिला ग्राम सभा, खाप के समांतर लाडो पंचायत, महिला हितैषी ग्राम पंचायत जैसे कई नवाचार उन्होंने शुरू किए। नौ जून 2015 को बेटी नंदिनी ने जब कैमरे से सेल्फी ली तो उसी समय सेल्फी विद डॉटर का विचार आया जो आज एक वैश्विक अभियान बन गया है।
घर के बाहर बेटी के नाम की नेम प्लेट
6 जुलाई 2015 को उन्होंने अपने घर के बाहर बेटी के नाम की नेम प्लेट लगाई। यह सामाजिक सोच में बदलाव की प्रतीक बन गई। अब तक देशभर में 80 हजार से अधिक घरों में बेटियों के नाम की नेम प्लेट लगाई जा चुकी हैं।
पिता की मुहिम बेटी बढ़ा रही आगे
सुनील जागलान ने शुरू किए गए कई अभियान जैसे गाली बंद घर, पीरियड चार्ट, बेटी हूं बेटी बोलो, आदि ने सामाजिक बदलाव को नई दिशा दी है। खास बात यह है कि अब उनकी बेटी नंदिनी भी इस मुहिम में पूरी भागीदार बन चुकी हैं। वह खुद गाली मुक्त स्कूल और फर्स्ट पीरियड स्माइल जैसे अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं और अपनी उम्र की लड़कियों के लिए प्रेरणा बन रही हैं।