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Jind News: मासूमियत पर मोबाइल फोन हावी, धुंधला कर रहा बचपन

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01 पीजीआई का राज्य व्यसन निर्भरता केंद्र। संवाद
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रोहतक। तेजी से बदलते इस युग में मनुष्य अपने सभी कार्याें के लिए मोबाइल व इंटरनेट पर निर्भर होता जा रहा है। यह निर्भरता कब लत बन जा रही है, पता ही नहीं चल पाता। मासूमियम पर मोबाइल फोन इस कद्र हावी है कि बचपन धुंधला कर रहा है।
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वहीं पीजीआई के राज्य व्यस्न निर्भरता उपचार केंद्र में सालाना 25 मरीज मोबाइल के ओवरयूज की समस्या को लेकर आ रहे हैं। डॉ. सिद्धार्थ आर्य बताते हैं कि एक महीने में एक से दो मरीज इससे पीड़ित मिल रहे हैं। इनमें 14 से 16 साल के किशोर सबसे अधिक हैं।

ऐसे किया जाता है उपचार
डॉक्टर सिद्धार्थ के अनुसार, मरीजों को काउंसिलिंग दी जाती है। अगर मरीज को अन्य मानसिक बीमारी है तो दवा देकर भी उपचार किया जाता है। मरीजों की काउंसिलिंग का फॉर्मेट समस्या के हिसाब से तय किया जाता है। जैसे कोई मरीज इंटरनेट के ओवरयूज के कारण अपने परिवार को समय नहीं दे रहा, कोई पैसा कमाने के लिए ऑनलाइन बैटिंग एप में लगा रहता है या बच्चे मोबाइल या इंटरनेट के कारण पढ़ाई, खेल आदि से दूर हो जाते हैं। इन स्थितियों को देखते हुए मरीज की काउंसिलिंग का फाॅर्मेट तैयार किया जाता है। काउंसिलिंग में मरीजों को समय प्रबंधन सिखाया जाता है। उनको इंटरनेट के सही इस्तेमाल का तरीका समझाया जाता है।
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सतर्कता...अभिवावक को पता हो, बच्चा किस एप्लीकेशन पर कितना समय बिता रहा
मोबाइल फोन के ओवरयूज को रोकने में अभिभावक भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। वे बच्चों को मोबाइल के सही इस्तेमाल के बारे में बताएं। इसके साथ ही उनको यह भी पता होना चाहिए कि बच्चा फोन में किस एप्लीकेशन पर कितना समय बिता रहा है। सरकारी टेली मानस पोर्टल पर हेल्पलाइन नंबर भी उपलब्ध है। फोन पर कांउसिलिंग के लिए 14416 पर कॉल की जा सकती है।

समाधान...ऑस्ट्रेलिया की तरह कदम उठाए सरकार
डॉक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चे समझ न होने के कारण फोन का ओवरयूज करने लग जाते हैं। इससे वे तनाव, चिंता से ग्रस्त हो जाते हैं। उनकी सोचने-समझने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसे लेकर सरकार ऑस्ट्रेलिया की तरह छोटे बच्चों के मोबाइल या इंटरनेट यूज को लेकर नीतियां बना सकती है। इससे बच्चों का मानसिक व शारिरिक विकास बेहतर हो पाएगा क्योंकि फिर बच्चा अपना अधिक समय फोन की बजाय, पढ़ाई व अन्य गतिविधियों में बिताएगा।

लक्षण...खाना-पीना तक भूल जाते हैं बच्चे
डॉक्टर सिद्धार्थ बताते हैं कि इससे ग्रस्त बच्चे खाना-पीना तक भूल जाते हैं। परिवार को समय न देकर मोबाइल गेम्स में लगे रहते हैं। घर में ज्यादा रहने लग जाते हैं। पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते। उनके स्वभाव में भी बदलाव आ जाता है। चिड़चिड़ापन रहने लगता है। तनाव व चिंता से ग्रस्त दिखते हैं।
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