जिन्हें मां बाप और समाज ने दुत्कारा, उन्हें सरोजानंद का मिला सहारा। जिनका कोई नहीं, उनके भगवान हैं सरोजानंद। जिनको नहीं मिला मां का प्यार, उन अनाथों को दिया मां का आंचल। ये बातें सुनी जा सकती है जींद की सब्जी मंडी की गलियों में। पुरुष प्रधान समाज में 64 वर्षीय महिला सरोजानंद दूसरों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं।
एक ओर जहां महिलाएं अपने घर में ही चूल्हा चक्की तक सीमित रहती हैं, वहीं सरोजानंद सन्यासी दुत्कारे बच्चों को लाड प्यार कर देश का भविष्य मजबूत करने में लगी है। सब्जी मंडी मोड़ के पास पिछले कई वर्षों से सरोजानंद आश्रम चला रही हैं। जहां मां-बाप बच्चे को जन्म देने के बाद लावारिस छोड़ देते हैं, सरोजानंद मां-बाप बनकर उनका पालन-पोषण करती हैं।
भिवानी में एक संपन्न परिवार में जन्म लेने वाली सरोजानंद की बचपन से ही परमार्थ करने की इच्छा थी तथा शिव भगवान के प्रति गहरी आस्था रही है। एमए, बीएड तक पढ़ाई करने के बाद इन्होंने पांच साल तक अध्यापन किया। शिक्षा विभाग में नौकरी मिलने के बावजूद उनकी इच्छा सन्यास का जीवन व्यापन करने की थी, इस बारे में उन्होंने कभी किसी से जाहिर नहीं किया।
अध्यापन करते समय परिवार व बाहर का कोई व्यक्ति सरोजानंद से पूछता कि अब तो तुम्हारी उम्र भी हो चुकी है, शादी कब करेगी तो उनका यही जवाब होता कि जब कोई उनसे ज्यादा पढ़ा-लिखा लड़का मिलेगा तो वह शादी कर लेगी। अध्यापन करते समय ही वह अपनी एक महिला दोस्त के साथ स्वामी दीप्तानंद अवदूत से मिली तथा उन्हें अपना गुरु मान लिया।
एक अध्यापिका जो काफी पढ़ी-लिखी थी, उनके एकदम से सन्यासी बन जाने से सभी को आश्चर्य हुआ। माता-पिता ने भी उनका विरोध किया तथा उसे सन्यासी नहीं बनने के लिए मनाने के लिए काफी प्रयास किए। मां-बाप के विरोध के बावजूद सरोजानंद ने सन्यास का मार्ग अपनाया। सरोजानंद के अनुसार जहां माया है, वहां प्रभु नहीं है और जहां प्रभु है वहां माया नहीं है। इसलिए उन्होंने पांच साल शिक्षा विभाग में नौकरी करने के बाद अपनी नौकरी छोड़ दी।
करवा चुकी हैं डेढ़ दर्जन लड़कियों की शादी
सरोजानंद अब तक डेढ़ दर्जन के करीब लड़कियों की शादी करवा चुकी है। इनमें आश्रम में गोद ली हुई लड़कियां तथा गरीब परिवारों की लड़कियां शामिल हैं। शादी से पूर्व लड़के व उसके परिवार के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त की जाती है। इसके बाद लड़का व लड़की सहमति से शादी करवाई जाती है। सरोजानंद ने अनाथ बच्चों की मां-बाप बनकर पालन-पोषण करने के साथ-साथ अच्छी शिक्षा भी दिलाई तथा अच्छे स्कूलों में दाखिला दिलाया।