जींद। शहर निवासी 46 वर्षीय आशुतोष शर्मा खुद हीमोफीलिया बीमारी से जूझते हुए दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बने हैं। इस बीमारी से बचाव का इंजेक्शन काफी महंगा है। इस वजह से किसी का उपचार न रुके, इसलिए वे संगठन बनाकर जरूरतमंदों निशुल्क इंजेक्शन उपलब्ध करा रहे हैं। साढ़े पांच साल से वे इस काम में जुटे हैं। उनका कहना है कि उनके लिए जरूरतमंदों की सेवा से बढ़कर कुछ नही है। उनका संगठन इस बीमारी से जूझ रहे लोगों को जागरूक भी कर रहा है, ताकि वह हतोत्साहित न हो।
आशुतोष के अनुसार जब खुद बीमारी से जूझ रहे थे तो उनके सामने जींद में एक बच्चा आया, जिसे यह बीमारी थी। बच्चे के माता-पिता के पास इंजेक्शन के पैसे नहीं थे और न ही सरकारी अस्पताल में इंजेक्शन उपलब्ध था। आशुतोष ने खुद के पैसों से उस बच्चे की मदद की। इसके बाद आशुतोष ने 2014 में पूरे हरियाणा से ऐसे मरीजों का पता लगाना शुरू कर दिया। 2017 में उन्होंने हीमोफीलिया सोसायटी जींद बनाई और अन्य लोगों के सहयोग से संस्था में पैसे के बजाय इंजेक्शन जमा करने शुरू कर दिए। वह पूरे हरियाणा में जहां भी इंजेक्शन की जरूरत होती है, वहां पहुंचा देते हैं। प्रदेश में काफी लोग ऐसे हैं, जो इंजेक्शन नहीं खरीद सकते, ऐसे में यह संस्था उनके लिए एक वरदान से कम नहीं है। (संवाद)
बीमारी से पीड़ित अधिकतर लोग संपर्क में
आशुतोष के अनुसार वह काफी लंबे समय से इस बीमारी से जूझ रहे हैं। पूरे प्रदेश में 750 लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। इनमें से अधिकतर मरीज उनके संपर्क में हैं। आशुतोष ने बताया कि यह एक अनुवांशिक बीमारी है। यह जन्मजात भी हो सकती है। इसमें मनुष्य को यदि कोई छोटी सी चोट भी लग जाए तो उसके खून का रिसाव नहीं रुकता है। यह खून का रिसाव शरीर के अंदर भी शुरू हो सकता है और बाहर भी। ऐसे में मरीज को फैक्टर-सात, आठ व नौ के इंजेक्शन लगवाने पड़ते हैं। तीन तीनों इंजेक्शन अलग-अलग व्यक्ति को उसकी शारीरिक परिस्थितियों के अनुसार लगाए जाते हैं। बाजार में एक इंजेक्शन की कीमत सात से आठ हजार रुपये तक है।
अस्पतालों में रखते हैं टीकों की उपलब्धता का ध्यान
आशुतोष शर्मा प्रदेशभर के सरकारी अस्पतालों में हीमोफीलिया के लिए लगाए जाने वाले इंजेक्शन की उपलब्धता की जानकारी रखते हैं। वह खुद भी कई बार सरकार से इस बीमारी के इलाज के लिए मिल चुके हैं। हीमोफीलिया के लिए समय-समय पर चिकित्सकों की ट्रेनिंग भी होती है, आशुतोष शर्मा यह भी ध्यान रखते हैं कि कहीं ट्रेनिंग किसी कारण निरस्त तो नहीं हुई, यदि होती है तो उसे दोबारा मांग कर शुरू करवाते हैं ताकि मरीजों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। जब किसी भी सरकारी अस्पताल में इंजेक्शन का स्टॉक खत्म हो जाता है तो संस्था की तरफ से तुरंत इंजेक्शन उपलब्ध करवाए जाते हैं, ताकि किसी मरीज को परेशानी न हो।