हर जंग में, चाहे वह आजादी की लड़ाई हो या फिर आजादी के बाद भारत-चीन और भारत-पाक युद्ध हो, जिले ने हर जंग में शहादत दी है। ऐसा ही जिले का गांव घिमाणा है, जिसके वीर बेटों ने हर जंग में अपनी शहादत दी है।
वीर जवानों की जन्म स्थली आज भी उपेक्षा की शिकार है। पिछले 20 साल से रजवाहा नंबर तीन का पानी टेल तक नहीं पहुंचा है। घिमाना से किनाना लिंक मार्ग तथा बिशनपुरा स्टेशन से घिमाणा तक रास्ता है। इन दोनों मार्गों को पक्का करवाने की ग्रामीण पिछले काफी समय से मांग कर रहे हैं।
बिशनपुरा स्टेशन से घिमाणा तक के रास्ते को पक्का करवाने की घोषणाएं इनेलो और कांग्रेस की सरकारों के समय हो चुकी है, लेकिन यह महज घोषणा तक ही सीमित रहा। एक बैठक में बैठकर हुक्के गुड़गुड़ाते हुए ग्रामीण गांव की समस्याओं पर बातचीत कर रहे थे। ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें देश के लिए शहादत देने वाले अपने गांव के वीर जवानों पर नाज है। प्रशासन ने आज तक देश के लिए शहीद हुए लोगों के परिवारों की सुध नहीं ली है। प्रत्येक साल गांव में कारगिल दिवस पर कार्यक्रम आयोजित होता है, लेकिन प्रशासन को यह दिन याद नहीं रहता है। यहां तक की सामाजिक संस्थाओं ने भी मुंह फेर लिया है।
गांव का इतिहास
भिवानी रोड पर शहर से सटे घिमाणा गांव की आबादी करीब सात हजार है। गांव में सभी समुदाय के लोग आपसी भाईचारे से रहते हैं। ग्रामीण सुनील आर्य ने बताया कि देश के लिए हर जंग में शहादत देने वाले इस गांव से फिलहाल इस समय भी दर्जनों लोग सेना में हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध में दी शहादत
वीर जवानों की धरती घिमाणा ने पहली शहादत आजादी से पूर्व द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दी। द्वितीय विश्वयुद्ध में घिमाणा बिहारी शहीद हुए।
भारत-चीन युद्ध में दीवान सिंह शहीद हुए
सन 1962 में भी घिमाणा गांव ने देश के लिए शहादत दी। गांव के दीवान सिंह ने भारत-चीन युद्ध के दौरान देश के लिए लड़ते हुए प्राण न्यौछावर कर दिए। इसी प्रकार 1971 के युद्ध में गांव के गोपाराम ने भी शहादत देकर देश की सीमा की रक्षा की।
शहीद के परिजनों को आज भी है सम्मान का इंतजार
देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले घिमाणा गांव के शहीद आशीष के परिजनों को आज भी सम्मान का इंतजार है। शहीद आशीष के परिजनों का कहना है कि सरकार ने घोषणाएं तो की, लेकिन उन्हें लागू नहीं किया। शहीद आशीष राजपूताना रायफल में तैनात थे। कारगिल की लड़ाई शुरू होते ही वे मोर्चे पर उतर गए। कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर दुश्मन को छकाते हुए राजपुताना रायफल का बहादुर सिपाही आगे बढ़ता रहा, लेकिन 15 जून 1999 को दुश्मन की गोली लगने से आशीष वीरगति को प्राप्त हो गए। इसके बाद आशीष के गांव घिमाना में उनके नाम से स्वागत द्वार बनाया गया। स्कूल के एक गेट का नाम भी शहीद आशीष के नाम रखा गया है।
शहीद आशीष के पिता राममेहर सरकारी घोषणाओं को महज फर्जीवाड़ा मानते हैं। शहीद आशीष के पिता राममेहर रूंधे गले से कहते हैं कि सरकार ने कभी आकर उनकी सुध नहीं ली। गांव के स्कूल का गेट जरूर उनके नाम से बना दिया, लेकिन इसकी देखरेख नहीं हो रही है। वहीं तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने गांव में शहीद आशीष के नाम से खेल स्टेडियम बनवाने की घोषणा की थी, जो अब तक पूरी नहीं हुई। पंचायत द्वारा जमीन देने की पूरी प्रक्रिया तैयार है, लेकिन सरकार इस ओर कोई रुचि नहीं ले रही है।