27जेएनडी36-सच्चाखेड़ा क्षेत्र में धान की फ सल का निरीक्षण करते कृषि वैज्ञानिक। स्रोत विभाग
- फोटो : मृतक किसान की फाइल फोटो।
जींद। कृषि विज्ञान केंद्र पांडू पिंडारा की टीम ने दबलैन, सच्चाखेड़ा, उचाना, बीबीपुर, किनाना में धान की फसल का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान टीम को गांव दबलैन और सच्चाखेड़ा में धान के कुछ बौने पौधे देखने को मिले। उनको सैंपल के तौर पर भी लिया। कृषि विशेषज्ञ डॉ. रामकरण गौड, कृषि वैज्ञानिक डॉ. धीरज पंघाल और डॉ. रवि ने बताया कि ऐसे पौधों में पत्तियों का रंग गहरा हरा होता है और पौधों का विकास पूर्णत: रुक जाता है।
संक्रमित पौधों की जड़ प्रणाली भी है जो कम विकसित होती है जिससे पोषक तत्वों और जल अवशोषण में कमी हो जाती है। टीम ने पाया कि कुछ स्थानों पर इस रोग को फैलाने वाला कीट सफेद पीठ वाला तेला है। यह कीट रोग को पौधों से पौधों में फैलाता रहता है।
वैज्ञानिकों ने किसानों से आह्वान किया है कि वह अपने खेत में लगातार निगरानी करें व बौने पौधे दिखाई देने पर तुरंत प्रभाव से कृषि वैज्ञानिकों और कृषि अधिकारियों से संपर्क करें। डॉ रामकरण गौड ने आह्वान किया कि किसान भाई रोगग्रस्त पौधों की पहचान करके उन्हें मिट्टी समेत उखाड़ कर गहरी गड्ढों में दबा दें या जलाकर नष्ट कर दें ताकि रोग का प्रसार न हो। नालियों और मेंढों की नियमित सफाई रखें और खरपतवारों को अपने खेत से हटा दें क्योंकि इन पौधों पर कीट आश्रय लेते हैं। खेत में अधिक जलभराव न होने दे। आवश्यकता पड़ने पर एक बार फिर से कीटनाशक का छिड़काव करें। किसान खेतों में लाइट ट्रैप का प्रयोग करें जिससे तेले का अवागमन का पता चल सके।