02जेएनडी08: हीर-रांझा सांग का मंचन करते हुए कलाकार। संवाद
अलेवा। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार और ऑन थिएटर ग्रुप के संयुक्त तत्वावधान में शामदो गांव में हरियाणवी सांग-स्वांग हीर-रांझा का मंचन किया गया। इसमें मुख्यातिथि के रूप में गांव के सरपंच प्रतिनिधि बिंद्र शर्मा ने शिरकत की। सांग का निर्देशन ऋषि कपूर ने किया।
उन्होंने कहा की सांग हमारी परंपरा का अंग रहे हैं। एक समय में यही मनोरंजन और सामाजिक सहयोग, सामाजिक उत्थान का कार्य भी करते रहे। स्वांग से हमारी लुप्त होती संस्कृति को बचाया जा सकता है। इनके मंचन आने वाली पीढ़ी के लिए होने चाहिए, ताकि हमारी सांस्कृतिक परंपरा को समझ सके।
ऋषि कपूर ने बताया कि सांग को लोक शैली में प्रस्तुत किया और सांग की रागनी गायन में लोक संगीत तथा कुछ स्थानों पर शास्त्रीय गायन का भी प्रयोग किया गया। सांग कलाकारों में सूत्रधार गायक समंदर लाल, कृष्ण लाल उर्फ लीला राम रहे। उन्होंने बताया कि हीर रांझा की कहानी दुनिया को ये बतलाती है कि इंसान के लिए प्यार से बड़ी दौलत और कुछ नहीं है। प्यार की पहचान हो जाए तो कोई बादशाह अपना तख्त छोड़कर संन्यासी तक बन सकता है। तख्त हजारे गांव के एक संपन्न परिवार का लड़का था रांझा। अपने मां-बाप का लाडला था। वहीं सियाल कबीले की हीर की सुंदरता के चर्चे हर तरफ थे। रांझा वैसे तो चार भाइयों में सबसे छोटा होने के कारण पिता का दुलारा था लेकिन अपने भाइयों और भाभियों के भेदभाव के कारण घर छोड़ दिया था। उसकी किस्मत उसे भटकाते हुए सियाल ले आई। यहीं उसने हीर को पहली बार देखा और उसे दिल दे बैठा। वो हीर के पिता के यहां भैंसों की देखभाल और उन्हें चराने का काम करने लगा। हीर भी उसकी मोहब्बत में पड़ चुकी थी। दोनों के प्रेम को बारह साल बीत गए। इस प्रेम कहानी के साथ वियोग तब जुड़ गया जब हीर की शादी सैदा खेड़ा के साथ कर दी गई। रांझा इस वियोग को सह न सका और गोरखनाथ से दीक्षा लेकर संन्यासी बन गया। वह हीर के वियोग में भटकता रहा और एक दिन किस्मत उसे हीर के ससुराल तक ले गई। यहां हीर को जहर दे दिया गया तथा रांझे ने भी उसके वियोग में मौत को गले लगा लिया।
02जेएनडी08: हीर-रांझा सांग का मंचन करते हुए कलाकार। संवाद