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गुरू हरगोबिंद सिंह के प्रकाशोत्सव पर्व पर गुरमत समागम

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भाई गुरदित्त सिंह, भाई ऋषि पाल सिंह का रागी जत्था गुरबाणी कीर्तन गायन करते हुए। - फोटो : Jind
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जींद। मीरी पीरी के बादशाह छठी पातशाही गुरु हरगोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व पर बुधवार को गुरुद्वारा सिंह सभा रेलवे जंक्शन और श्री गुरुसिंह सभा भारत सिनेमा रोड में गुरमत समागम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम से पहले सुबह साढ़े दस बजे से बारह बजे तक सुखमनी सेवा सोसायटी के सदस्यों ने सुखमनी साहिब का जाप किया गया। इसके बाद गुरुद्वारा साहिब के रागी भाई गुरदित्त सिंह, ऋषिपाल सिंह और संतोख सिंह ने गुरबाणी का गायन किया।
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गुरु घर के प्रवक्ता बलविंदर सिंह ने बताया कि ऐतिहासिक गुरुद्वारा गुरु तेग बहादुर साहिब में कीर्तन दरबार सजाया गया। जिसमें गुरुघर के रागी भाई जसबीर सिंह, भाई हरदीप सिंह व भाई करमजीत सिंह के रागी जत्थे एवं करनाल से आए भाई चरणजीत सिंह के रागी जत्थे द्वारा गुरबाणी का गायन किया गया। गुरुद्वारा साहिब के प्रधान ग्रंथी भाई गुरविंदर सिंह रत्तक ने अपने कथा प्रवचन में गुरु हरगोबिंद सिंह की जीवनी को संगतों से रूबरू करवाया। बलविंदर सिंह ने बताया कि गुरु हरगोबिंद सिंह ने गुरु गद्दी संभालने के बाद दो तलवारें धारण की थी। इन तलवारों को मीरी पीरी का नाम दिया गया। मीरी नामक तलवार भौतिक संसार पर विजय पाने यानि युद्ध का प्रतीक थी वहीं पीरी नामक तलवार आध्यात्मिक ज्ञान पर विजय पाने यानि धर्म व संस्कृति की रक्षा करने की प्रतीक थी। इन दोनों तलवारों में से गुरू साहिब ने पीरी को श्रेष्ठ माना था। उन्होंने बताया कि ढाढी वारों का प्रचलन सबसे पहले गुरु हरगोबिंद सिंह के राज में ही हुआ था। क्योंकि यह माना जाता था कि ढाढी वारें युद्ध शुरू होने से पहले सैनिकों में जोश व साहस पैदा करने का कार्य करती थी तथा आज भी ढाढी जत्थे सिख इतिहास की कुर्बानियों को अपनी वारों में पिरो कर संगतों को सुना कर निहाल करते हैं।
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