रेलवे के निजीकरण के खिलाफ बैठक करते रेलवे कर्मचारी।
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सरकार रेलवे का निजीकरण कर रही है। इससे रेलवे कर्मचारियों में सरकार के प्रति भारी रोष है, जबकि रेलवे कभी घाटे में नहीं रही है। यह बात नॉर्दर्न रेलवे मेंस यूनियन (एनआरएमयू) के सचिव सुरेंद्र छोक्कर ने यूनियन कार्यालय में पत्रकारवार्ता के दौरान कही।
उन्होेंने कहा कि संविधान में भी कहा गया है कि अगर कोई सरकारी विभाग घाटे में नहीं है तो सरकार उसका निजीकरण नहीं कर सकती है, लेकिन रेलवे का निजीकरण हो रहा है। रेलवे 102 प्रकार की श्रेणी में लोगों को किराया में छूट देती है। रेलवे का निजीकरण होने पर कर्मचारियों के साथ-साथ आम जनता पर इसका प्रभाव देखने को मिलेगा। यूनियन रेलवे के निजीकरण के खिलाफ हमेशा आवाज उठाती रही है। जब यूनियन सरकार से मांगों को लेकर मिलती है तो और तो सरकार उस समय कहती कुछ और है और करती कुछ और है।
छोक्कर ने कहा कि सरकार कर्मचारियों को 55 साल की उम्र व 30 साल के कार्यकाल के बाद रिटायर्ड करने का नियम लागू करना चाहती है, जो यूनियन के प्रयास के कारण अब तक लागू नहीं हो पाया है। अभी सरकार ने 150 स्टेशन और 150 ट्रेनों को निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है। इसके चलते रेलवे कर्मचारियों में सरकार के प्रति रोष है। यूनियन के सदस्य ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन (एआईआरएमएफ) के तत्वाधान में 14 से 19 सितंबर तक जन जागरण सप्ताह मना रही है। इसके चलते रेलवे कर्मचारी 17 सितंबर को बाइकों पर जुलूस निकालते हुए लोगों को सरकार की निजीकरण की नीतियों के खिलाफ जागरूक करेंगे। 18 सितंबर को कर्मचारी कैंडल मार्च निकालेंगे और 19 सितंबर को सभी कर्मचारी काले बिल्ले लगाकर काम करते हुए रोष प्रकट करेंगे।
छोक्कर ने कहा कि निजीकरण के कारण रेलवे कर्मचारियों से ज्यादा आम जनता को हानि होगी, क्योंकि ट्रेनों में अन्य परिवहन सुविधा की तुलना में यात्रियों को सफर के लिए सबसे कम किराया लिया जाता है। रेलवे का निजीकरण होने पर रोजगार के अवसर समाप्त होंगे। अभी रेलवे ही सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर देता है। निजीकरण होने पर कंपनियां सिर्फ अपने मुनाफे के लिए काम करेंगी, उन्हें सार्वजनिक दायित्व से कोई मतलब नहीं रहेगा। इसलिए यूनियन रेलवे का निजीकरण किसी भी हालत में नहीं होने देगी।