26जेएनडी31: पं. सत्यनारायण शांडिल्य। संवाद
उचाना। प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी पं. सत्यनारायण शांडिल्य ने कहा कि माया के प्रभाव के कारण ही जीव को अपने परम हितैषी प्रभु भी पराया लगने लगते हैं। यह जानने के बाद भी कि सबकुछ यहीं छूट जाना है, कुछ भी साथ नहीं जाने वाला है, फिर भी मनुष्य मूढ़ों की तरह धन, संपत्ति, पद इत्यादि के पीछे पड़कर जीवन व्यर्थ गवां रहा है। माया जीव को सदैव भ्रम में रखती है। जो अपना है नहीं उसे अपना समझना ही तो भ्रम कहलाता है।
उन्होंने कहा कि माया ऐसी जादूगरनी है कि कई-कई बार धोखा खाया जीव भी पुन: इसके जाल में फंस ही जाता है। सत्संग के आश्रय से ही अंत: चक्षु खुल सकते हैं और जीव के अंत: चक्षुओं से ही भ्रम का पर्दा हट सकता है। माया के ज्यादा चिंतन के कारण ही जीव दुख पा रहा है। माया नहीं मायापति का आश्रय करो व लक्ष्मी नहीं लक्ष्मी नारायण के दास बनो, तो ये लोक और परलोक दोनों सुधर जाएगा।