बंदरों के आतंक से परेशान शहर के लोगों को अभी बंदरों से निजात मिलने की उम्मीद नहीं है। दरअसल छह महीने पहले नगर परिषद ने टेंडर मांगे थे। इसके लिए एक ही फर्म ने टेंडर दिया था, लेकिन उसका रेट अधिक होने पर यह योजना अधर में लटक गई। छह महीने बाद भी यह योजना नगर परिषद की फाइलों में अटकी है। वहीं शहर में करीब तीन हजार बंदर लोगों को परेशान कर रहे हैं। शहर के लोग बंदरों के आतंक से परेशान हैं। इसके लिए नगर परिषद ने एक साल पहले सदन में बंदर पकड़ने का प्रस्ताव पास किया था। इसके लिए नगर परिषद ने टेंडर भी लगाया, लेकिन इनमें नगर परिषद को टेंडर लगाने वाली फर्म में बंदर पकड़ने के लिए प्रति बंदर 800 रुपये का दाम दिया। वहीं नगर परिषद को 200 रुपये प्रति बंदर का रेट आने की उम्मीद थी। इसके चलते टेंडर नहीं हो सका। इसके बाद यह टेंडर रद्द कर दिया गया है। इसके लिए नगर परिषद अब दोबारा से टेंडर की प्रक्रिया शुरू करेगा।
कलेसर के जंगलों में छोड़े जाने थे बंदर
बंदरों को जींद से पकड़कर यमुनानगर स्थित कलेसर के जंगलों में छोड़ने की योजना थी, लेकिन टेंडर सिरे नहीं चढ़ने से पूरी प्रक्रिया बीच में ही लटक गई है।
घर बने जेल, कैद होकर रह गए लोग
बंदरों का आतंक इतना ज्यादा है कि कई लोगों ने बंदरों से बचने के लिए घरों को लोहे के जाल लगवाए हैं। इससे पूरे घर को कही जेल की तरह बंद कर दिया गया है।
घर के अंदर भी घुस जाते हैं बंद
जहां एक ओर लोगों को बंदरों के काटने का डर रहता है, वहीं घरों में रखे सामान का भी नुकसान होने का डर लगा रहता है। रोहतक रोड निवासी श्याम लाल गुप्ता के अनुसार बंदर घरों के अंदर घुस जाते हैं और रसोई में रखा सामान बिखर देते हैं। कई बार तो फ्रिज तक से सामान निकाल कर खराब कर देते हैं।
सात साल बाद शुरू हुई प्रक्रिया
शहर में बंदरों को पकड़ने की प्रक्रिया सात साल बाद शुरू हुई है। इससे पहले 2012 में भी नगर परिषद द्वारा बंदरों को पकड़ा गया था। इसके बाद अब फिर से बंदरों को पकड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई है, लेकिन यह सिरे नहीं चढ़ रही है।
बंदरों को पकड़ने के लिए नगर परिषद ने प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन इसमें टेंडर का रेट अधिक आया जिसके चलते टेंडर नहीं किया गया। ऑनलाइन टेंडर प्रक्रिया में यह रद्द करना होता है। अब दोबारा से टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
पूनम सैनी, चेयरमैन, जींद नगर परिषद।