नागरिक अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में दाखिल घायल।
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गांव कंडेला के निकट सोमवार को कैंटर और सवारियों से भरे थ्री व्हीलर की टक्कर में लगभग एक दर्जन लोग घायल हो गए। घायलों को उपचार के लिए नागरिक अस्पताल में दाखिल करवाया गया। जहां से चिकित्सकों ने पांच लोगों की गंभीर हालात को देखते हुए पीजीआई रोहतक रेफर कर दिया। पुलिस मामले की जांच कर रही है। पुलिस के अनुसार गांव प्रेमखेड़ा निवासी बीरेंद्र सिंह का परिवार गांव बराह खुर्द में मौत पर शोक जताने के लिए आ रहे थे। जब वह गांव कंडेला के निकट पहुंचे तो जींद की तरफ से आ रहे तेज रफ्तार कैंटर ने थ्री व्हीलर को टक्कर मार दी। इसमें थ्री व्हीलर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया और उसमें सवार गांव प्रेमखेड़ा निवासी वीरेंद्र, भोती, सीतो, केला, पालो, शोभा, बाला, करनैल, वीरेंद्र, गांव फफड़ाना निवासी राजेश, उसकी पत्नी सोनिया घायल हो गए। कैंटर चालक हादसे को अंजाम देकर मौके से फरार हो गया। हादसा होते ही राहगीर मौके पर पहुंच गए और घायलों को नागरिक अस्पताल में पहुंचाया। जहां से चिकित्सकों ने करनैल, भोती देवी, वीरेंद्र, राजो, सीतो की गंभीर हालत को देखते हुए पीजीआई रोहतक रेफर कर दिया। हादसे की सूचना पाकर सदर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
घायलों को पीजीआई ले जाने के लिए नहीं मिली एम्बुलेंस
राहगीरों ने किसी तरीके से घायलों को नागरिक अस्पताल पहुंचाया, लेकिन आपातकालीन कक्ष में सभी घायलों के पहुंचने के बाद वहां पर अव्यवस्था का माहौल बन गया। इस दौरान हादसे एक ही बेड पर दो-दो मरीजों को लेटा दिया गया। लेकिन इस दौरान घायलों को चिकित्सकों ने पीजीआई रेफर कर दिया। जब स्वास्थ्य कर्मी मरीजों को पीजीआई ले जाने के लिए अस्पताल से बाहर गेट पर पहुंचे तो वहां पर एम्बुलेंस ही नहीं मिली। इस दौरान लगभग 15 मिनट तक मरीज बाहर ही स्ट्रेचर पर पड़े रहे, लेकिन जब एम्बुलेंस नहीं आई तो वापस मरीजों को आपातकालीन कक्ष में वापस लेकर गए। जहां पर लगभग पौने घंटे तक मरीज स्ट्रेचर पर ही लेटे रहे। बाद में स्वास्थ्य अधिकारी हरकत में आए मरीजों के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था करवाई गई। इसके बाद घायलों के परिजनों ने राहत की सांस ली।
ग्लूकोज लगाकर शरीर पर रखी बाटल
आपातकालीन कक्ष में मरीजों की उपचार की केवल खानापूर्ति होती नजर आई। आपातकालीन कक्ष में मरीजों को इंजेक्शन लगाने के बाद ग्लूकोज की बोतल लगा दी, लेकिन ग्लूकोज की बोतलों को मरीजों के शरीर पर ही रख दी। इससे ग्लुकोज चढ़ने की बजाए नालियों से वापस ब्लड आता रहा।