जींद। हर वर्ष लोगों को थैलेसीमिया बीमारी के बारे में जागरूक करने के लिए 8 मई को विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया जाता है। जिले में इस बीमारी से ग्रसित 30 लोग हैं। इनमें बच्चे भी शामिल हैं। आमतौर पर हर सामान्य व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणिकाओं की उम्र करीब 120 दिन होती है, लेकिन थैलेसीमिया से पीड़ित में 20 दिन रह जाती है। इसका सीधा असर हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। इसके कम होने पर व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है और हर समय किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त रहने लगता है।
थैलेसीमिया खून से संबंधित एक आनुवंशिक बीमारी है। इस बीमारी में इलाज किस प्रकार किया जाएगा, यह इस बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता हैं। मेजर थैलेसीमिया मरीजों को कम उम्र में डायग्नोसिस किया जाता है। उन्हें आजीवन ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता होती है। इस वजह से उनके जीवन जीने की उम्र कम हो जाती है, जबकि माइनर थैलेसीमिया मरीजों में केवल एनीमिक स्थिति नजर आती है।
नागरिक अस्पताल से समय-समय पर रक्त की सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है। जो थैलेसीमिया से ग्रस्त हैं, उन्हें अपने जीवन की रक्षा के लिए हर 15वें दिन पीआरबीसी (पैक्ड रेड ब्लड सेल) ब्लड चढ़वाना पड़ता है। यदि समय पर यह ब्लड कंपोनेंट न चढ़ाया जाए तो इन रोगियों की जान को खतरा रहता है। पहले नागरिक अस्पताल में पीआरबीसी ब्लड की यह सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इससे थैलेसीमिया रोगियों को रोहतक पीजीआई या खानपुर मेडिकल कॉलेज जाना पड़ रहा था।
थैलेसीमिया की पहचान
खुद इस बीमारी से जूझ रहे हिमोफीलिया सोसायटी जींद से आशुतोष शर्मा ने बताया कि थैलेसीमिया असामान्य हीमोग्लोबिन और रेड ब्लड सेल्स के उत्पादन से जुड़ा एक ब्लड डिसऑर्डर है। इस बीमारी में रोगी के शरीर में रेड ब्लड सेल्स कम होने लगते हैं। हर समय कमजोरी, थकावट महसूस करना, पेट में सूजन, डार्क यूरिन, त्वचा का रंग पीला पड़ सकता है।
फेरिटिन टेस्ट की व्यवस्था करने की मांग
जींद में थैलेसीमिया के मरीजों के लिए फेरिटिन टेस्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। फेरिटिन टेस्ट शरीर में फेरिटिन के स्तर को मापने वाला एक रक्त परीक्षण है। यह एक प्रोटीन है, जिसमें आयरन होता है और यह शरीर में आयरन के भंडारण और इस्तेमाल को नियंत्रित करता है। फेरिटिन टेस्ट से शरीर में आयरन के भंडार का पता चलता है और लौह संचय क्षमता का आकलन होता है। इससे थैलेसीमिया जैसी स्थितियों के निदान और इलाज में मदद करती है। आशुतोष शर्मा ने कहा कि यदि इस टेस्ट की सुविधा जींद में उपलब्ध हो जाए तो यह थैलेसीमिया रोगियों के लिए काफी कारगर साबित होगा।
थैलेसीमिया का इलाज ब्लड ट्रांसफ्यूजन, केलेशन थेरेपी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट का विकल्प है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट महंगा है। इसके लिए डोनर का एचएलए मिलना भी जरूरी है। अधिकांश मरीज ब्लड ट्रांसफ्यूजन पर जीवित हैं। अस्पताल में थैलेसीमिया प्रभावित मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध करवाया जा रहा है। -डॉ. शिप्रा, ब्लड बैंक प्रभारी।