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नाटक के माध्यम से बदलते सामाजिक परिवेश पर कटाक्ष
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अमर उजाला ब्यूरो
जींद।
एक्टिव थियेटर एंड वेलफेयर सोसाइटी, हरियाणा कला परिषद् व हरियाणा संस्कृत अकादमी द्वारा किए जा रहे 11 दिवसीय नवरस राष्ट्रीय नाट्य उत्सव के सातवें दिन मंगलवार रात को सुदेश शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक संध्या छाया’ का मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से निर्देशक ने दिखाया कि किस प्रकार युवा देश के हालातों को पसंद नहीं कर रहे हैं। वह यहां के हालात बदलने की बाजये विदेश को ही अपना घर मान लेते हैं। बच्चों के विदेश में रहने से मां-बाप को होने वाली परेशानियों को करीब से दिखाया गया।
नाटक की कहानी एक ऐसे घर से शुरू होती है, जिसमें बूढ़े मां-बाप रहते हैं। बुजुर्ग व्यक्ति रेलवे से सेवानिवृत्त अधिकारी है और उनका एक बेटा सेना में है, जिसकी सेवा कश्मीर में चल रही हैं। दूसरा बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर अमेरिका में नौकरी कर रहा है। दोनों बुजुर्ग हमेशा ही बेटों की याद कर समय व्यतीत करते हैं। इसी बीच अमेरिका से एक युवक उनके घर आता है। वह बुजुर्ग दंपति द्वारा भेजे गए डॉलर उन्हें देता है। इस पर उसकी मां बेटे के देश लौटने के बारे में पूछती है तो जवाब मिलता है कि उसने आने के बारे में कुछ नहीं कहा। उसकी मां कहती है कि यहां उसकी शादी के लिए लड़की देखी है। वह युवक बताता है कि उनके बेटे ने तो अमेरिका में ही शादी कर ली। कहानी आगे बढ़ती है और सीमा पर लड़ाई शुरू हो जाती है। इसमें दंपति का फौजी बेटा शहीद हो जाता है। इस पर जब अमेरिका वाला बेटा आता है तो, बुजुर्ग दंपति उसे देश लौटने को कहते हैं। यहां से कहानी में बदलाव आता है। विदेश में रहने वाला युवक कहता है कि वह अब भारत को अपना देश नहीं मानता। उसने कहा कि यहां कोई व्यवस्था नहीं है। पढ़े लिखे लोग भी सड़कों पर कचरा डालते हैं। भ्रष्टाचार चर्म पर है, यहां वह क्या करेगा। हालांकि उसका पिता उसे काम शुरू करने के लिए पैसा देने का भी ऑफर करता है, लेकिन वह नहीं मानता और वापस अमेरिका लौट जाता है। अंत में दोनों बुजुर्ग घर के नौकर के साथ ही रहने को मजबूर होते हैं। नौकर की नवजात बच्ची में ही वे अपनी पौत्री का अक्श देखते हैं।
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दंपति के संवाद ने खूब गुदगुदाया
नाटक में बुजुर्ग दंपति के संवाद ने लोगों को खूब हंसाया। एक दृश्य आता है, जब एक युवक किसी का पता पूछते-पूछते उनके घर आता है। महिला उसको चाय के साथ गूझियां खाने को देती है। मौका पाकर जब महिला का पति भी गूजिंया खाने लगता है तो महिला शूगर बढ़ी होने का हवाला देकर उसे रखवा देती है। इस प्रकार के दृश्यों पर दर्शकों ने खूब लुत्फ उठाया।


देश की व्यवस्था पर कटाक्ष
नाटक में निर्देशक ने बुजुर्ग दंपति के विदेश में रहने वाले बेटे से देश की वर्तमान समस्याओं को उजागर करवाया है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार हमारे युवाओं की मेहनत के बल पर दूसरे देश तरक्की कर रहे हैं और यहां भ्रष्टाचार के खेल में उनके हुनर को मौका नहीं मिलता।
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कहानियों के बाल रंगमंच कर मंचन आज
आयोजन रमेश भनवाला ने बताया कि वीरवार को कहानियों के बाल रंगमंच की प्रस्तुति दी जाएगी। इसमें विद्यार्थियों को पठ्यक्रम में आने वाली कहानियों पर आधारित नाटक तैयार किया गया है। इसमें अधिकतर कलाकार भी स्कूलों के विद्यार्थी ही हैं।
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