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जच्चा ब्च्चा को ढाई घंटे बाद मिली एंबुलेंस

Sat, 26 Dec 2015 01:44 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला/झज्जर
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कोई हादसा घटित होने पर लोग एंबुलेंस के लिए सिविल अस्पताल या फिर मदद के लिए पुलिस कंट्रोल रूम को। लोगों के सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि हादसे के बाद अस्पताल से एंबुलेंस तुरंत मिलेगी... इसका भरोसा नहीं। शुक्रवार को सिविल अस्पताल में दाखिल एक जच्चा बच्चा को ही एंबुलेंस के लिए करीब ढाई घंटे इंतजार करना पड़ा। हादसे के बाद ऐसा हो तो शायद ही पीड़ित की जान बचाना संभव हो। असल में सिविल अस्पताल में एंबुलेंस व्यवस्था पूरी तरह से डगमगा गई है।
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एक घंटे का वेट, ढ़ाई घंटे में मिली एंबुलेंस
गर्भवती महिलाओं या जच्चा बच्चा सुविधा को लेकर स्वास्थ्य विभाग कितने ही चौकसी के दावे करे, लेकिन गाहे बगाहे पोल खुल ही जाती है। गर्भवती महिलाओं के लिए एनआरएचएम के तहत विशेष एंबुलेंस की सुविधा सविल अस्पताल में है, लेकिन यह कारगर कितनी है, शुक्रवार को सिविल अस्पताल में दिखाई पड़ा। गांव सिवाना माजरा निवासी मोंटी की पत्नी किरण ने सिविल अस्पताल में शनिवार को बच्चे को जन्म दिया था। शुक्रवार को उसे यहां से छुट्टी मिली। जच्चा बच्चा को घर ले जाने के लिए एंबुलेंस की मांग की गई तो इसे मिलने में करीब ढाई घंटे लगे। मोंटी ने एंबुलेंस रूम पर पर्ची कटवाई। उसे एक घंटा वेट करने को कहा गया। एक घंटे बाद भी एंबुलेंस नहीं मिली। वह बार बार खिड़की पर गया, लेकिन हर बार उसे कुछ और देर लगने की बात कही गई। आखिर में एंबुलेंस उसे ढाई घंटे बाद मिली।

इन हालातों में बढ़ी दिक्कत
एंबुलेंस सेवा पूरे जिले में ही डगमगाई हुई है। जिले में 250 गांवों के लिए मात्र 20 एंबुलेंस हैं। फिलहाल 15 चल रही हैं, जबकि 5 खराब हैं। जो चल रही हैं उनमें से भी कई खटारा हैं। कब धोखा दे जाए कोई नहीं जानता। पंद्रह एंबुलेंस के चलने का दावा तो स्वास्थ्य अधिकारियों का है पर असल स्थिति कुछ और ही है। शुक्रवार को जच्चा बच्चा को एंबुलेंस नहीं मिली तो इसकी पड़ताल अमर उजाला ने की। जो जानकारी मिली वह चौंकाने वाली है। दरअसल  सिविल अस्पताल में मात्र तीन 3 एंबुलेंस हैं और इनमें से भी दो खराब पड़ी हैं। हालांकि सेवा से जुड़े कर्मियों ने इस तथ्य को छिपाते हुए कहा कि दो एंबुलेंस फिल्ड में हैं, लेकिन मौके पर मौजूद तीनों एंबुलेंसों के ड्राइवर पोल खोलने के लिए काफी थे। सिविल अस्पताल में प्राइवेट अस्पताल से एंबुलेंस की सेवा नहीं ली जाती, ऐसे में मौजूदा स्थिति मरीजों की पीड़ा और बढ़ाने वाली है।
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न ड्राइवर न बजट
करीब एक महीना पहले शहर की सामाजिक संस्था ने एक एंबुलेंस स्वास्थ्य विभाग को सौंपी थी, लेकिन यह जंग खा रही है। इसे चलाने के लिए विभाग के पास न तो ड्राइवर है और न ही पेट्रोल आदि के लिए बजट मिल रहा है। एंबुलेंस जिस हालत में मिली थी, महीने भर से वैसे ही खड़ी है। संस्था ने यह एंबुलेंस शवों को ले जाने के लिए दी है, लेकिन विभाग ने मरीजों के लिए सेवा मांगी तो संगठन तैयार नहीं हुआ। इसके अलावा तीन अन्य एंबुलेंस खराब हालत में मैकेनिक यार्ड में खड़ी हैं। इनको ठीक कराने के लिए बजट की फाइल पंचकूला मुख्यालय भेजी गई है, लेकिन बजट नहीं मिल रहा।

कंडम एंबुलेंस में मरीज
सिविल अस्पताल में फिलहाल दो एंबुलेंसों को चलाया जा रहा था। इनमें से एक तो कंडम हालत में है। इसके दोनों तरफ दरवाजे गल चुके हैं। इनको वैल्ड कर स्थाई तौर पर ही बंद करना पड़ा है। पीछे का दरवाजा ही काम कर रहा है। एंबुलेंस की बॉडी जर्जर है। कभी भी हादसे का पर्याय बन सकती है। अधिकारी कोई ध्यान नहीं दे रहे।


स्वास्थ्य विभाग में 20 एंबुलेंस हैं, जिनमें से 15 ऑन रोड चल रही हैं। सिविल अस्पताल में तीन एंबुलेंस हैं, कभी कभार तीनों को ही भेजना पड़ जाता है, इस कारण मरीज को तुरंत एंबुलेंस देना संभव नहीं है। जच्चा बच्चा सिविल अस्पताल में दाखिल थे। मौके पर एंबुलेंस नहीं थी, इस वजह से कुछ वेट करने के लिए बोला गया था। एंबुलेंस आते ही उनको उपलब्ध करा दी गई।
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सतीश कुमार, एफएम, एंबुलेंस कंट्रोल रूम
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