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शहर तो इन्होंने ही जलवाया अब कैसे करें भरोसा

Thu, 25 Feb 2016 12:43 AM IST
अमर उजाला झज्जर/ब्यूरो
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..अरे साहब, जिनसे हम सुरक्षा की आस लगाए थे, वही पुलिसकर्मी थाने पर हमला होने के बाद अपनी वर्दी उतार उपद्रवियों में शामिल हो नारे लगा रहे थे।
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उन्होंने ऐसा क्यों किया इसका पता नहीं, शायद अपनी जान बचाने के लिए। एक सिपाही तो कई दिन तक पड़ोस के घर फेंकी गई अपनी वर्दी उठाने तक नहीं आया।

एक सिपाही तो थाने के पास पीर पर चढ़ी चादर लपेट कर ही फुर्र हो गया। शहर को जलवाने वाले तो यही हैं, फिर अब सुरक्षा का भरोसा करें भी तो कैसे।

व्यापारियों, दुकानदारों का दर्द बुधवार को तब सामने आया, जबअमर उजाला ने हिंसा के हालात को लेकर उनसे बातचीत की।

व्यापारी फूट पड़े और बोले कि उपद्रवियों की मंशा का सभी को पता था, लेकिन प्रशासन ने जो किया इसकी आस नहीं थी।

अधिकारियों ने पूरा शहर ही उस झुंड के हवाले कर दिया जो कि सुबह से ही मरने मारने व तोड़फोड़ पर उतारू था।

शनिवार को जो कुछ हुआ, वह काफी भयावह था। सारा वाकया मेरी आंखों के सामने हुआ। तोड़फोड़ करने आए लोगों में कोई किसी का डर नहीं था। प्रशासन ने समय पर कोई सुध बुध नहीं ली। प्रशासन सचेत होता तो शहर तबाह होने से बच गया होता। कहीं कोई पुलिस कर्मी नहीं था। जो थे वो भी छिप गए।
-शिव कुमार

हालातों से ऐसा बयां हो रहा था कि कुछ रक्षक ही भक्षक बनके आ गए हों। जिसके कारण शहर जल रहा है। उपद्रवी पुलिस के सामने थे, लेकिन पुलिस व प्रशासन रोकने की बजाय कूच कर गया। अब हम भुगत रहे हैं।
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-राकेश कुमार

खौफ का ऐसा मंजर पहले कभी नहीं देखा। पूरा समाज भयभीत था। सेना आने के बाद कुछ राहत मिली। उम्मीद है कि अब शायद फिर से अमन कायम होगा। लोग दंगे का दर्द भूल कर एक साथ रहेंगे।
-डॉ रमेश कुमार चावला

इन हालातों से जाहिर हो रहा है कि शायद प्रशासन को शहर की कोई चिंता ही नहीं थी। जो कर्मचारी जान माल की सुरक्षा के  लिए तैनात किए गए थे आखिर वे शहर में हो रही अगजनी की घटनाओं को मूक दर्शक बनकर क्यों देखते रहे।
-राजेश कुमार

अब तो आगे से भी प्रशासन से भरोसा उठ गया है। हमें आज की छोड़ो अब तो कल की चिंता ने भी परेशान कर रखा है। अब तो मिलिट्री के आने कुछ माहौल ठीक हुआ है। लेकिन अगर कल फिर किसी बात को लेकर कोई नई घटना जन्म लेती है, तो सुरक्षा की जिम्मेवारी कोन लेगा। अब ना तो सरकार पर विश्वास है और ना ही प्रशासन पर। हां सेना पर जरूर है।
-राहुल कुमार

अगर प्रशासन ने समय रहते भीड़ को काबू करने की कोशिश की होती तो ये हालात ना होते। घटना का मुख्य कारण राजनीतिक रोटियां सेकना रहा। उनको लगता है राजनीतिक दबाव मे ही पुलिस मूकदर्शक बनी शहर को जलता देखती रही।
-राजकुमार

जो पुलिस कर्मचारी इस प्रकार के हालातों में खुद की रक्षा के लिए सहारा ढूंढते फिर रहे थे वो किसी ओर की रक्षा करने में कैसे सक्षम हो सकते हैं। लेकिन बाद में भारी पुलिस बल की मौजूदगी में भी किसी ने उपद्रवियों को रोकने की हिम्मत नहीं जुटाई।
-मोनू

अब मरे सांप को पीटने से क्या फायदा। जो हुआ, किसकी लापरवाही रही, सबके सामने है। अब प्रयास हो कि भाईचारा बने। सुरक्षा के प्रति जो भरोसा उठ गया है, उसे तो बहाल करने के प्रयास हों।
-अशोक अरोड़ा, प्रधान व्यापार मंडल

बस स्टैंड क्षेत्र में शनिवार को हिंसा का नंगा नाच देखा है। बच्चे अभी तक डरे हुए हैं, कहते हैं कि दुकान पर नहीं जाना। वहां तो लोग जला देंगे। झज्जर इस दर्दनाक सच को शायद वर्षों तक न भुला पाए।
-प्रेम पोपली, दुकानदार

क्या कहना है आईजी का
व्यापारियों की बैठक में इस प्रकार की जानकारी मिली कि हिंसा के दौरान पुलिस कर्मी लापरवाह थे। इसकी जांच कराई जाएगी। आरोपों में सच्चाई मिलती है तो आरोपियों पर नियमानुसार कार्रवाई होगी। व्यापारियों या शहरवासियों को सुरक्षा के प्रति चिंतित होने की जरूरत नहीं है।
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उनको नाकों के बारे में जानकारी दी गई है। जहां भी पुलिस की जरूरत है, वहां पर पुलिस या फौज तैनात की गई है। शहर में 400 जवान तैनात हैं और 36 नाके लगा कर शहर की घेराबंदी की गई है। बस जरूरत अफवाहों से सावधान रहने की है।
-केके राव, आईजी
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