बादली। दिल्ली और गुरुग्राम जैसे बड़े शहरों के बीच स्थित झज्जर जिले का बादली गांव अपने गौरवशाली इतिहास, वीरता और संघर्ष की अनूठी गाथा के लिए जाना जाता है। इसके कारण बादली की दादी बोदली के नाम से भी पहचान है।
जानकारों के अनुसार बादली को बदरसेन नामक शासक ने बसाया था। बाद में ईरान से आए सैय्यद मुसलमानों ने यहां आक्रमण किया। इसमें बदरसेन की हत्या हो गई। इस संघर्ष में कई सैय्यद भी मारे गए और गांव वीरान हो गया। इसके बाद रोर जाति ने गांव को दोबारा बसाया। करीब 1120 ईसवीं में यहां आए लोगों ने गुलिया जाट समुदाय का रूप ले लिया।
रोर जाति यहां से उत्तर दिशा की ओर चली गई थी जिनका आज भी बादली गांव में भाईचारे के साथ आना जाना है। धीरे-धीरे बादली नए स्वरूप में विकसित होता गया।
वर्तमान में बादली की आबादी 17 हजार से अधिक है, जबकि गांव में 10 हजार 532 मतदाता हैं। इनमें 5 हजार 566 पुरुष और 4 हजार 966 महिला मतदाता शामिल हैं। गांव चार प्रमुख पानों-चौधराण, लाख्याण, मिंघाण और चूड़ाण में विभाजित है। इनमें चौधराण सबसे बड़ा और प्रभावशाली पाना माना जाता है।
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बादली का इतिहास संघर्ष, वीरता और बार-बार पुनर्निर्माण की कहानी है। गांव ने प्राकृतिक आपदाओं, आक्रमणों और कई ऐतिहासिक घटनाओं का सामना किया लेकिन हर बार फिर खड़ा होकर अपनी नई पहचान बनाई।-जयसिंह रोहिला, ग्रामीण।
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गांव की सबसे बड़ी विशेषता संघर्षपूर्ण इतिहास है। यह गांव एक-दो नहीं, बल्कि 10 बार उजड़कर दोबारा बसा है। प्राकृतिक आपदाओं, आक्रमणों और बदलते समय की चुनौतियों के बावजूद ग्रामीणों ने हर बार अपने गांव को फिर से बसाया। -श्रीओम शर्मा, ग्रामीण।
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बादली केवल एक गांव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और आपसी भाईचारे की जीवंत मिसाल है। गांव की विरासत को सहेजना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। सभी जातियों और समुदायों की सहभागिता ने बादली को सामाजिक समरसता और भाईचारे की मिसाल बना दिया है।-आनंद गुलिया, सरपंच।
फोटो नंबर 71: चौराहे पर बैठकर इतिहास पर चर्चा करते बादली के ग्रामीण। (संवाद)
फोटो नंबर 71: चौराहे पर बैठकर इतिहास पर चर्चा करते बादली के ग्रामीण। (संवाद)
फोटो नंबर 71: चौराहे पर बैठकर इतिहास पर चर्चा करते बादली के ग्रामीण। (संवाद)
फोटो नंबर 71: चौराहे पर बैठकर इतिहास पर चर्चा करते बादली के ग्रामीण। (संवाद)