उर्दू-हिंदी के प्रख्यात कवि डॉ. राणा प्रताप गन्नोरी के जन्मदिन पर कलमवीर विचार मंच द्वारा उनके सम्मान में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।
दिल्ली के युवा गजलकार मनीष मधुकर व अस्तित्व अंकुर के सान्निध्य में महाराजा अग्रसेन भवन में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता बहुचर्चित साहित्यकार ज्ञान प्रकाश विवेक ने की और संचालन का दायित्व गीतकार कृष्ण गोपाल विद्यार्थी ने संभाला।
गोष्ठी में उपस्थित रहे क्षेत्र के कवियों सतपाल स्नेही, कृष्ण सौमित्र, शिव कुमार पाराशर, करुणेश वर्मा व अर्चना ठाकुर ने जहां अपनी गजलों के माध्यम से जीवन के बहुआयामी चित्र प्रस्तुत किए वहीं शिव ओम शिव व लखमीचंद डैरोलिया ने अपनी व्यंग्य रचनाओं से व्यवस्था पर कड़े प्रहार किए।
लगभग तीन घंटे चले इस कार्यक्रम के दौरान अतिथि कवियों को शाल व अंगवस्त्र भेंटकर सम्मानित भी किया गया।
हरियाणा की स्वर कोकिला अर्चना ठाकुर की सरस्वती वंदना से शुरू हुए इस कार्यक्रम में डॉ. राणा प्रताप गन्नोरी ने अपनी काव्य यात्रा के अनेक यादगार संस्मरण सुनाने के अलावा हिंदी, उर्दू व सिरायकी में लिखीं अपनी कई गजलें सुनाईं।
उनके इन शेरों को सर्वाधिक पसंद किया गया : कैसे-कैसे गमों का हलाहल, हमको पीना पड़ा जिंदगी भर। एक मरने की खातिर ही राणा, हमको जीना पड़ा जिंदगी भर !
तुमको पत्थर ही जो बनना है तो कुछ बेहतर बनो। राह का पत्थर न बनकर, मील का पत्थर बनो।
युवा कवि अस्तित्व अंकुर की इन पंक्तियों ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया -
सिर्फ चाहत की जंग ऐसी है, जिसमें लड़ने बीमार जाते हैं।
या तो दोनों ही जीतकर लौटे, या तो दोनों ही हार जाते हैं।
युवा गजलकार मनीष मधुकर के इन शेरों को भरपूर दाद मिली-
भटकना पड़ता है दर-दर यहां पर, मकां बन पाता है तब घर यहां पर। कोई तो बात है इस बुत में वरना, झुका होता नहीं ये सर यहां पर।
अपने अध्यक्षीय संबोधन के दौरान विवेक जी ने कई खूबसूरत गजलें भी सुनाईं। उनके इन शेरों को बेहद सराहा गया-
दस्तकें दर पे बहुत देर तलक दीं उसने, काश इक बार मेरा नाम पुकारा होता।
वो जो धरती पे भटकता रहा जुगनू बनकर, कहीं आकाश में होता तो सितारा होता। मनीष मधुकर द्वारा किए गए आभार-प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम का विधिवत समापन हुआ।