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नासा में वैज्ञानिक रहे भापड़ोदा निवासी डॉ. जगजीत का निधन

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नासा में स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन के प्रमुख वैज्ञानिक रह चुके वैज्ञानिक डॉ. जगजीत सिंह का 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन पर न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में शोक की लहर फैल गई है। पैतृक गांव भापड़ोदा में भी लोगों की आंखें नम हैं। वहीं 16 जुलाई को उनका अंतिम संस्कार होगा। डॉ. जगजीत सिंह का जन्म गांव भापड़ौदा के किसान परिवार में 20 मई 1926 में हुआ। 1943 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा लायलपुर (अब पाकिस्तान) से प्राप्त की और पूरे संयुक्त पंजाब में प्रथम स्थान प्राप्त किया। विज्ञान स्नातक एवं स्नातकोत्तर की डिग्री पंजाब विश्वविद्यालय से की। फिर न्यूक्लियर फिजिक्स में पीएचडी लिवरपूल यूनिवर्सिटी इंग्लैंड से प्राप्त की। पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने लगातार 1943 से 1947 तक छात्रवृत्ति प्राप्त की। वेस्ट वर्जीनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में 1965 तक एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दी। कॉलेज ऑफ द विलियम्स एंड वेरी में 1965 से 67 तक अध्यापन कार्य किया। सन 1972 से 1998 तक ओल्ड डोमिनियन यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहे। इस दौरान 16 विद्यार्थियों को एमएस और पीएचडी के लिए गाईड किया। नासा में वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक के रूप में लैंगली शोध केंद्र से 1978 तक जुड़े रहे। 1978 से 1994 तक इंस्ट्रूमेंट रिसर्च डिवीजन में चीफ साइंटिस्ट के रूप में कार्य किया। 1994 से 1998 तक एक्सपेरिमेंटल एंड टेक्नोलॉजी डिवीजन में मुख्य वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया। जबकि 1998 से 2000 तक नासा लैंगली रिसर्च सेंटर के शोध निर्देशक के रूप में कार्य कलिया। डॉ. सिंह की 246 साइंटिफिक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए। दुनिया के 30 प्रमुख शोध संस्थानों में उन्होंने अपने भाषण दिए, 50 विज्ञान और अभियांत्रिकी पर आधारित पुस्तकों की समीक्षा की, एनवायरमेंट एंड एयरोस्पेस मैनेजमेंट साइंस पर आधारित दो पुस्तकों का संपादन किया, दो राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन की अध्यक्षता की। डॉक्टर जेजे सिंह को नासा अपोलो अचीवमेंट अवॉर्ड, नासा फ्लैग अवॉर्ड, नाशा स्पेशल ग्रुप सर्टिफिकेट मोमेंट अवॉर्ड, 6 टेक्नोलॉजी यूटिलाइजेशन अवॉर्ड, 5 यूनाइटेड स्टेट सिविल सर्विस तथा आउटस्टैंडिंग प्रोफेशनल्स अवॉर्ड प्राप्त किए, इसके अलावा 10 यूनिवर्सिटी स्टेट पेटेंट्स आपके नाम से हैं। इसके साथ ही 2004 में आपको अमेरिका में मेडल ऑफ ऑनर तथा फेम फॉर आउटस्टैंडिंग लीडरशिप 2005 में सम्मानित किया गया, 2005 में इंटरनेशनल अवार्ड ऑफ द मेरिट कैम्ब्रिज यूके में आपको प्रदान किया गया।
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भारत में करना चाहते थे न्यूक्लियर लैब स्थापित
डॉ. जगजीत सिंह ने न्यूक्लियर फिजिक्स शोध पूर्ण कर इंग्लैंड से वापस भारत आए। भारत आने के बाद उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मुलाकात की और देश में ही न्यूक्लियर लैब स्थापित कर शोध का प्रस्ताव दिया था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें देश की खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर असमर्थता जाहिर की। इसके बाद डॉ. सिंह ने अमेरिका की ओर रुख किया। जहां उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया। अंतिम समय में उनकी इच्छा अपने देश की सेवा करने की रही।
विज्ञान से ही कर ली थी शादी
डॉ. सिंह को अपने गांव और अपने देश के प्रति गहरा लगाव था। महत्वपूर्ण पद पर होने के बावजूद भी वे भारत आते जाते रहते थे। उन्होंने अपने पैतृक गांव भापड़ौदा में अपना फार्म हाउस बनवा रखा था। जहां पर वे आकर रुकते थे। ग्रामीण युवाओं को कड़ी मेहनत और लग्न से पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि भारतीय युवाओं में प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन उचित मार्गदर्शन और सुविधाएं न मिलने से वे पिछड़ जाते हैं। डॉ. सिंह आजीवन कुंवारे रहे। उनका कहना था कि उन्होंने तो विज्ञान से ही शादी कर रखी है।
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