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कोरोना की मार से कराह रहे कुंभकार, भेंट चढ़ा झझरी का व्यापार

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छावनी मोहल्ले में झझरी बनाता महावीर सिंह। संवाद - फोटो : Jhjhar
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झज्जर। शहर झझरी के नाम से देशभर में प्रसिद्ध है। यहां की झझरी(सुराही) फिल्म नगरी मुंबई के लोगों की भी पसंद बनती है। वहीं मुंबई के अलावा राजस्थान की गुलाबी नगरी के लोग भी यहां की झझरी में होने वाले ठंडे पानी से गर्मी के मौसम में अपने गलों को ठंडक पहुंचाते हैं। लेकिन पिछले साल कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के बाद झझरी बनाने वाले कुंभकार इसकी मार से कराह रहे हैं। झझरी का व्यापार ठप हो गया है। लॉकडाउन की आशंका के कारण बड़े शहरों से मिलने वाले आर्डर नहीं मिल रहे हैं। इससे झझरी बनाने वाले परिवारों को लाखों रुपये का नुकसान हो रहा है।
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झज्जर शहर में लॉकडाउन लगने से पहले 25 परिवार झझरी बनाने का काम करते थे, लेकिन अब केवल छावनी मोहल्ले के चार परिवार ही झझरी बना रहे हैं। बाकी ने झझरी बनाने का काम छोड़कर मटके बनाने या फिर अन्य कोई काम-धंधा शुरू कर दिया है। झज्जर में बनी झझरी दिल्ली, गुड़गांव, रेवाड़ी, राजस्थान के जयपुर, कोटा, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा व देश की आर्थिक राजधानी एवं फिल्म नगरी मुंबई में भी आपूर्ति की जाती थी। झज्जर शहर में करीब दो दर्जन परिवार झझरी बनाने के काम में जुटते थे। उनका सीजन मार्च, अप्रैल व मई में होता है। फिलहाल झझरी की डिमांड बहुत कम है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती जाएगी उसी प्रकार झझरी की मांग भी बढ़ती है, लेकिन कोरोना के कारण झझरी दूसरे राज्यों में नहीं भेजी जा रही हैं। गर्मी के सीजन में झज्जर से 25 से 30 हजार झझरी विभिन्न राज्यों में भेजी जाती थी। यहां पर थोक के भाव में 30 से 40 रुपये तक की झझरी बेची जाती थी। अन्य राज्यों में इसकी कीमत 60 से 70 रुपये तक होती थी। फिलहाल एक परिवार दिनभर में 50 से 80 तक झझरी बनाती है। जब मांग बढ़ जाती है तो उस समय झझरी बनाने की संख्या 150 तक पहुंच जाती है। लेकिन अब केवल चार परिवार ही झझरी बना रहे हैं, वे भी अपने क्षेत्र में ही झझरी बेचते हैं।(संवाद)
मिट्टी के लिए आती है परेशानी
झझरी बनाने के काम में जुटे छावनी मोहल्ला निवासी महाबीर आदि का कहना है कि झझरी व मटके बनाने के लिए मिट्टी भी बड़ी मुश्किल से मिलती है। उन्होंने कहा कि चिकनी मिट्टी लाने के लिए एक रेहड़ी के करीब 500 से 600 रुपये तक अदा करने पड़ते हैं। इसके बाद झझरी तैयार करने पर भी काफी खर्चा व मेहनत आती है। इसके चलते मटके व झझरी बनाने वाले कारीगरों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है।
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नासिक मेें भेजी जाती थी झझरी
पिछले साल फरवरी में 2000 झझरी महाराष्ट्र के नासिक भेजी गई थी। उसके बाद लॉकडाउन लगने की वजह से झझरी नहीं भेजी गई। नासिक में कम से कम 20 से 25000 झझरी जाती थी, जोकि इस बार दो हजार झझरी गई हैं। पिछले साल हमारे गर्मी के सीजन में ही लॉकडाउन लगया था। उसकी वजह से पूरे साल खाली बैठे रहे और इस बार भी सामान की डिमांड भी नहीं आ रही।
- वेद प्रकाश।
पिछले साल काम का सीजन शुरू होते ही लॉकडाउन लग गया था। इस बार सभी ने झझरी बनाना छोड़ दिया। पहले 25 परिवार झझरी बनाते थे। अब चार ही परिवारों में मिट्टी का काम किया जा रहा है।
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- लखमी चंद।
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