झज्जर। वैसे तो झज्जर का नाम भी झझरी यानी सुराही से ही पड़ा है। यहां पर छावनी मोहल्ले में बनाई जाने वाली झझरी का दिल्ली से लेकर मुंबई तक डंका बज रहा है। काली व पीली मिट्टी के मिश्रण से बनी सुराही में लंबे समय तक पानी ठंडा रहता है। इसमें छोटे-छोटे छिद्र होने के कारण यह बाहर से हवा सोख लेती है।
अब भीषण गर्मी के बढ़ने के साथ ही डंडे पानी की जरूरत महसूस होने लगी है। गला तर करने के लिए लोग तमाम कोशिश करते हैं। घरों में महंगे फ्रीज, वाटर कूलर, आरओ लगवा रहे हैं। झज्जर की झझरी की तो बात ही अलग है। (संवाद)
दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, चंडीगढ़ तक विशेष मांग
शहर के छावनी मोहल्ले में दिसंबर से ही सुराही बननी शुरू कर दी जाती है। झज्जर की सुराही की दिल्ली, राजस्थान के भीलवाड़ा, कोटा, जयपुर, महाराष्ट्र, गुजरात, चंडीगढ़ में विशेष तौर पर मांग है। शहर के छावनी मोहल्ले से गाड़ी में भरकर सुराही देशभर में भेजी जाती हैं। सुराही में रखा पानी ठंडा रहने के साथ स्वादिष्ट भी होता है। सुराही को बनाने वाले ज्यादातर कारीगर छावनी मोहल्ले में रहते हैं। यहां के कई कारीगर राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। इनमें छावनी के इंद्रपाल मुख्य हैं।
छावनी मोहल्ले में सुराही को तैयार करते हैं कारीगर
कारीगर जितेंद्र उर्फ जैकी ने बताया कि पहले कारीगरों के पास सुराही की इतनी डिमांड थी कि फुर्सत नहीं मिलती थी। अब घरों में फ्रिज को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है। इस कारण यहां सुराही मांग कम, जबकि बाहर ज्यादा बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि सुराही को बनवाने के लिए दिसबंर माह से ऑर्डर आने शुरू हो जाते हैं। सितंबर के अंत तक काम चलता है। उसका कहना है कि दूसरे राज्यों व महानगरों में सुराही भेजने में काफी खर्च बढ़ जाता है। जिसके चलते सुराही के दाम भी दो से तीन गुना हो जाते हैं।
थोक रेट में 50 रुपये तक बिकती है सुराही
देश के विभिन्न राज्यों से ऑर्डर आने पर सुराही को बनाने का काम शुरू हो जाता है। थोक में सुराही की कीमत 50 रुपये है, जबकि बेचने के लिए 70 से 80 रुपये तक रखी है। सुराही बनाने के लिए काली व पीली मिट्टी का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि दोनों मिट्टी विशेष तौर पर सुराही में पानी को ठंडा रखती है। एक सुराही बनाने में करीब सात से आठ किलो मिट्टी लग जाती है। एक ट्रक में करीब 2800 सुराही दूसरे राज्यों में भेजी जाती हैं। करीब एक लाख के आसपास झज्जर से तैयार होकर सुराही दूसरे राज्यों में भेजी जा रही है।
मिट्टी के लिए आती है परेशानी
कुंभकारों को मिट्टी नहीं मिलने से लगातार समस्या का सामना करना पड़ रहा है। जितेंद्र ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों से करीब चार हजार रुपये की एक ट्राॅली मिट्टी खरीदनी पड़ रही है, जोकि काफी महंगी है। कुंभकारों को मिट्टी की समस्या से दो चार होना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि यदि मिट्टी नहीं मिली तो सुराही, मटके बनाने की कला खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी।