झज्जर। ‘जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर, जान देने की रुत रोज आती नहीं, हुस्न और इश्क दोनों को रुसवा करे, वो जवानी जो खूं में नहाती नहीं। आज धरती बनी है दुल्हन साथियों...अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।’ ये लाइनें आज भी मुझे झकझोर देती हैं।
मैंने सन 1965 की लड़ाई में 15 दुश्मनों को मौत के घाट उतारा। आज तक मलाल है, देश के लिए मैं अपने प्राण न्यौछावर नहीं कर सका। ये कहना है आर्य नगर निवासी रिसलदार तारीफ सिंह धनखड़ का। तारीफ सिंह सन 1965 की लड़ाई के साक्षी हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने 15 जवानों को मौत के घाट उतारा था।
युद्ध में उनकी रेजीमेंट के 14 जवान शहीद हुए थे। सेकेंड लांसर आर्म्ड कौर रेजीमेंट के जवान रहे रिसलदार तारीफ सिंह बताते हैं कि जब पाकिस्तान के साथ युद्ध की तैयारी हो रही थी, तब जवानों में एक अलग ही जोश और जुनून था।
हर सैनिक बस यही चाहता था कि दुश्मन का सीना चीर कर उस पर फतह हासिल कर ली जाए। उनकी रेजीमेंट ‘जय बजरंगबली’ का नारा लगाकर दुश्मन पर टूट पड़ी थी। फिर जो लड़े, तो जीत कर ही दम लिया।’ उन्होंने बताया कि उस लड़ाई में बस मलाल इतना है कि उन शहीदों में उनका नाम शामिल नहीं हो पाया। 28 अगस्त 1965 को भारत पाकिस्तान के बीच हुई जंग को अपनी यादों में संजोए हुए रिसलदार जंग के एक-एक पल को समेटे हैं। उन्होंने बताया कि जिस समय युद्ध हुआ, उस समय हर जवान मर मिटने के लिए तैयार था।
भूख की किसी ने परवाह नहीं की
धनखड़ कहते हैं कि सीमा पर लड़ने के लिए पेट भरा होने की जरूरत नहीं होती है, बस हौसला चाहिए। हमारे पास भी खाने के लिए भोजन नहीं था, मगर हौसला अथाह था। बस उसी के सहारे हम लड़ते चले गए। पीने के लिए पानी नहीं था। जंग के दौरान कई जवानों को पूरा दिन एक ही बोतल से काम चलाना पड़ता था। हर जवान यही सोचता था कि जो घायल हो जाएगा, उसे पानी पिलाया जाएगा। तारीफ सिंह ने बताया कि जब किसी साथी को गोली लगती थी, तो बाकी जवानों का गुस्सा व जोश दोगुना हो जाता था। साथी की जान का बदला लेने के लिए और जोश के साथ दुश्मन पर हमला किया जाता था।