साल्हावास। परिवार के चेहरे पर ये जो मुस्कान हंसती है, पिता ही है जिसमें सब की जान बसती है...पंक्तियां पिता पर सटीक बैठती हैं। क्योंकि पिता ही है जो अपनी खुशियां और अपने सपने बच्चों में देखते हैं। बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए वह हमेशा संघर्ष करते रहते हैं। ऐसे ही पिता है अंतरराष्ट्रीय शूटर मनु भाकर और डेफ ओलम्पिन वीरेंदर उर्फ गूंगा पहलवान के, इनके संघर्ष में इनके पिता का भी अमूल्य योगदान रहा हैं।
बेटी को निशानेबाज बनाने के लिए पिता ने छोड़ दी नौकरी
झज्जर स्थित गोरिया गांव की मनु भाकर बॉक्सिंग और मार्शल आर्ट में पदक जीत चुकीं हैं। उनका करियर खेलों में चोट लगने पर उनकी मां ने खत्म करा दिया, लेकिन मर्चेंट नेवी में इंजीनियर पिता रामकिशन ने पहली बार उनके हाथ में पिस्टल थमाई। स्कूल में पढ़ाई के बाद रोजाना 6 से 7 घंटे निशाना लगाने के जुनून ने मनु के कदम शूटिंग की तरफ बढ़ा दिए। शूटिंग में बेटी की रुचि देखकर पिता रामकिशन ने उसे शूटर बनाने की ठानी। इसके लिए उन्होंने नौकरी भी छोड़ दी। रामकिशन भाकर ने मनु के पिस्टल लाइसेंस के लिए काफी लंबा संघर्ष किया था। मनु भाकर की हर छोटी-बड़ी खुशी में उसके पिता आज भी शामिल होना नहीं भूलते हैं।
ऐसे बदली स्थिति
एक दिन मनु पिता के साथ स्कूल में शूटिंग करते हुए बच्चों को देख रही थी। तब पिता ने शूटिंग कोच से पिस्टल ट्राई करवाने की अपील की। शूटिंग कोच ने मनु को पिस्टल दी तो मनु ने पहली बार में ही सही निशाना लगा दिया। इस पर कोच ने मनु को शूटिंग में रखने की बात कही। मनु ने शूटिंग की प्रैक्टिस के साथ मेडिकल की भी तैयारी की। देखते-देखते मनु के पदकों की संख्या बढ़ती गई और आज मनु इतिहास रच रही है। मनु भाकर अर्जुन अवार्डी, भीम अवार्डी सहित अनेकों अवार्ड से सम्मानित हो चुकी हैं। हाल ही में उन्होंने ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया है।
पिता अजीत सिंह आज भी बनाते हैं विरेंद्र सिंह के लिए खाना
विरेंद्र सिंह उर्फ गूंगा पहलवान के पिता अजीत सिंह आज भी अपने पहलवान बेटे के लिए खुद खाना बनाते हैं। दिल्ली में रहकर छठे डेफ ओलंपिक की तैयारी करने वाले वीरेंद्र सिंह के लिए उसके पिता हर समय उनके साथ तैनात रहते हैं। वीरेंद्र सिंह का भोजन उनके पिता ही तय करते हैं। खेत हो या अखाड़ा वीरेंद्र के पिता हमेशा उनके साथ रहते हैं। वीरेंद्र सिंह अपनी उपलब्धि में पिता को अहम मानते हैं। वीरेन्द्र सिंह ने बचपन में ही सुनने की क्षमता खो दी और वह कभी बोल भी नहीं पाए। लेकिन पिता के संघर्ष ने वीरेंद्र सिंह को फर्श से अर्श तक पहुंचाया। विरेंद्र सिंह उर्फ गूंगा पहलवान को कुश्ती की प्रेरणा भी अपने पहलवान पिता से मिली।
पिता अजीत सिंह सीआईएसएफ में एएसआई के पद पर रहे
वीरेंद्र सिंह के पिता अजीत सिंह सीआईएसएफ में एएसआई तैनात थे। वीरेंद्र को कुश्ती के लिए उनके चाचा सुरेंद्र सिंह दिल्ली ले आए। पिता और चाचा पहलवान थे, कुश्ती खेलने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। दिल्ली में वह अपने पिता अजीत सिंह और चाचा को कुश्ती करते हुए देखकर वीरेंद्र की भी इच्छा हुई। जब कुश्ती में वीरेंद्र ने अपनी प्रतिभा दिखाई तो उसके कौशल को निखारना शुरू कर दिया। डेफ ओलंपिक में वीरेंद्र सिंह तीन बार स्वर्ण पदक और दो बार कांस्य पदक जीता है।
विरेंद्र सिंह उर्फ गुंगा पहलवान अपने पिता अजीत सिंह से आशीर्वाद लेते हुए।