एडवोकेट पंकज शर्मा ने बताया कि करीब 300 वर्ष पहले इस मंदिर में बिमला नाम की एक सेविका प्रतिदिन मंदिर में सेवा करने के लिए आती थी। इससे उसका मन सेवा में लगा रहता था। वहीं उस महिला के पति फौज में नौकरी करते थे। एक दिन उसके पति फौज से छुट्टी आते है तो पड़ौसियों की तरफ से उसके समक्ष उसकी पत्नी व बाबा प्रसाद गिरी महाराज की चुगली की जाती थी।
वहीं, इस दौरान उसके पति की मौत हो जाती है। इसके बाद बिमला पर पड़ौसियों की तरफ से आरोप लगाए जाते हैं कि उन्हीं के कारण उनके पति की मौत हुई है। इसके बाद वह यह बात बाबा प्रसाद गिरी महाराज को बताती है। बाबा प्रसाद गिरी महाराज उनको अपने पति की शव यात्रा को मंदिर के आगे से लेकर जाने के लिए कहते है। वहीं उसके बाद वह घर जाकर यह बात बताती है तो परिवार वाले उसकी बात को स्वीकार कर लेते है।
जब परिवार वाले उसकी शव यात्रा को मंदिर के आगे से लेकर जाते है तो बाबा प्रसाद गिरी महाराज उनके शव को नीचे रखवाकर उनके ऊपर जल के छिड़काव व अपने चिमटे से उसको जीवित कर देते है और अपने बचे हुए प्राण उसके अंदर डाल देते है। वहीं इस दौरान धरती फटती है और बाबा प्रसाद गिरी महाराज उसमें समा जाते है। वहीं इसके बाबा प्रसाद गिरी महाराज मंदिर के अंदर जीवित समाधि ले लेते है। सोमवार के दिन बाबा प्रसाद गिरी महाराज ने जीवित समाधि ली थी और उसी दिन दुल्हेंडी का भी पर्व था। वहीं इसके बाद से श्रद्धालु यहां पर सोमवार के दिन अपनी मनोकामना पूरी होने की मन्नत मांगने आते है और मन्नत पूरी होने के बाद यहां पर दुल्हेंडी के दिन पंखे चढ़ाए जाते है।
होली पर्व के अवसर पर यहां पर संत सम्मेलन व भंड़ारे का आयोजन भी किया जाता है। पिछले 52 वर्षों से यहां पर संत सम्मेलन व भंडारे का आयोजन किया जा रहा है। बाबा प्रसाद गिरी मंदिर के महंत परमानंद गिरी महाराज के गुरु ब्रह्मलीन श्रीमहंत धर्मराज गिरी महाराज ने इस परंपरा को शुरू किया था। इस अवसर पर दूर-दूर से संत यहां पर आते है और श्रद्धालुओं को अपना आशीर्वाद देते है।
वहीं, होली पर्व तक शहर भर में प्रभात फेरी निकाली जाती है। इसके बाद दुल्हेंडी के अवसर पर यहां पर पंखे चढ़ाए जाते है और भारी संख्यां में श्रद्धालु यहां पर संतो का आशीर्वाद प्राप्त करते है। दुल्हेंडी के दिन ही मंदिर के बाहर मेला भी लगाया जाता है। इससे अगले दिन सुबह हवन यज्ञ किया जाता है और दो दिनों तक सत्संग का आयोजन होता है। वहीं दो दिनों के सत्संग के बाद यहां पर विशाल समष्टि भंड़ारा लगाया जाता है।