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Jhajjar-Bahadurgarh News: अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे व्रती, दूसरे दिन रखा व्रत

Thu, 07 Nov 2024 01:13 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़
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छठ महापर्व को लेकर पूजा पाठ से संबंधित सामान खरीदकर ले जाते एक परिवार के सदस्य। संवाद
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बहादुरगढ़। सूर्यदेव की उपासना के चार दिवसीय लोक आस्था के छठ महापर्व के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी को व्रतियों ने खरना मनाया। इसका मतलब शुद्धिकरण है, इसे लोहंडा भी कहा जाता है। व्रतियों ने परंपरा अनुसार प्रसाद के तौर पर घरों में खीर बनाई। आज अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने का समय शाम 5 बजकर 26 मिनट है। शुक्रवार को उदीयमान सूर्य को सुबह 6 बजकर 47 मिनट है। 8 नवंबर तक चलने वाले चार दिवसीय छठ पूजा महापर्व को लेकर बहादुरगढ़ के अंदर पूर्वांचलवासियों में खासा उत्साह है। नहर किनारे घाटों पर पूजा-अर्चना करने के लिए साफ-सफाई की गई।
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बाजारों में जमकर हुई खरीदारी

खरना के दिन बाजारों में लोगों ने जमकर खरीददारी की। पर्व के पहले दिन मंगलवार को व्रती नहाय-खाय प्रक्रिया से गुजरे। बुधवार को व्रतियों ने खरना किया और वीरवार को सूर्यास्त के समय अर्घ्य दिया जाएगा। बिहार के सिवान की रहने वाली कलावती, मधुबनी के रहने वाले चंचल, उत्तर प्रदेश के बलिया की रहने वाली सुमन, गोपालगंज बिहार की सुमन और संजय ने बताया कि भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए छठ पर्व मनाया जाता है। पूर्वांचल क्षेत्र के लोग इस पर्व को उत्साह के साथ मनाते हैं।



तीसरे दिन शाम को व्रती तालाब में उतरकर करते हैं पूजा

व्रतधारियों ने अपना चूल्हा अलग रखा और अरवा चावल, चने की दाल व लौकी की सब्जी का सेवन किया। हरिकरण ने कहा कि यह पर्व बहुत कठिन पर्व है। 4 दिन तक चलने वाले इस पर्व में निर्जला व्रत भी रखना होता है। दूसरे दिन व्रती खरना करते हैं। तीसरे दिन की शाम को व्रती पानी के घाट या तालाब में उतरते हैं और ढलते सूरज को अर्घ्य देते हैं। पर्व के अंतिम दिन यानी अब 8 नवंबर की सुबह उदीयमान सूरज को अर्घ्य देकर मन्नतेंं मांगी जाएंगी। इसके बाद यह पर्व संपन्न हो जाएगा।
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छठ पर्व में होता है सूर्यास्त पूजन

पूर्वांचलवासी हरिकरण, मनोज, प्रदीप समेत कई अन्य ने बताया कि पर्व के दौरान व्रती को सादगी और पवित्रता को अपनाना होता है। व्रत में नारियल, अनानास, अदरक, शरीफा, गागल, अभरक, आंवला, सुपारी, लोंग, इलाइची, चावल, मटर, ईख, टोकरी और छाज आदि वस्तुओं का इस्तेमाल होता है। व्रत के समापन होने पर गुड़ और आटे का देशी घी से ठेकुआ बनाया जाता है।
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