वर्तमान में प्रदेश में शायद ही ऐसी कोई अनाजमंडी हो, जो कि धान, बाजरा या फिर कपास की फसल से अटी न पड़ी हो। लेकिन इससे उलट कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ के गृह जिले झज्जर में अनाजमंडी सूनी पड़ी है।
जिस समय मंडी में फसल के ढ़ेर लगने का समय है वहां बच्चे क्रिकेट का शौक पूरा कर रहे हैं। आढ़ती भी खाली बैठे हैं। मामला पिछले दिनों कार्यकर्ताओं की बैठक ले रहे मंत्री धनखड़ के समक्ष भी उठाया जा चुका है।
उनका जवाब भी आया कि मंडी के दिन फिरेंगे, यह अभी गर्भ में है। किसान जहां फसल को बेचने के लिए दूर दराज की मंडियों में जाने पर विवश हैं, वहीं आढ़ती इसको लेकर परेशान हैं कि कमीशन पर परिवार का पालन पोषण टिका है, फसल नहीं तो कमीशन कैसा।
गौरतलब है कि मंडी में आढ़तियों की 55 दुकानें हैं। मंडी वर्षों से आबाद है, लेकिन फसल नहीं आती। केवल गेहूं पर ही यहां के व्यापारियों का कारोबार निर्भर है। अभी कपास, धान व बाजरा की आवक का समय है, लेकिन मंडी में 35 हजार क्विंटल केवल बाजरे की ही आवक हुई है।
किसान धान को लेकर जहां बेरी या बहादुरगढ़ मंडी में पहुंचे हैं, वहीं दिल्ली के नजफगढ़ तक की दौड़ भी किसानों को लगानी पड़ी है। यह स्थिति भी तब है, जबकि मंडी के लिए आढ़ती लंबी लड़ाई लड़ चुके हैं।
असल में मंडी में अधिकतर व्यापारी जमींदार परिवारों से हैं और उनको फसलों के मोल भाव का ज्यादा पता नहीं है, ऐसे में वे सरकारी खरीद से जुड़ी फसल ही खरीद पाते हैं। बाहरी मंडियों के व्यापारियों से कटे होने के कारण भी वे अपने रिस्क पर फसल खरीदते हुए हिचकिचाते हैं जिसका सीधा असर आवक पर पड़ता है।
...ये था मंडी का प्रारूप
वर्ष 1974 में झज्जर अनाजमंडी के लिए 84 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। मंडी में 200 दुकानों का प्रावधान किया गया था। अनाजमंडी के साथ इसमें कपड़ा मार्केट, चारा मंडी, बैंक परिसर आदि का विचार रखा गया था।
बाद में सरकार ने मंडी की जगह लघु सचिवालय के लिए अलॉट कर दी। अब मंडी सिर्फ 12 एकड़ में है। न तो बैंक है, ना ही कपड़ा मार्केट या फिर चारा मंडी। सिर्फ अनाजमंडी है और वह भी फसलों के अभाव में खाली पड़ी रहती है।
बोले मंत्री
किसान चाहेंगे तो अगले साल से झज्जर मंडी में हर तरह की फसलों की खरीदारी की व्यवस्था की जाएगी। सरकार वैसे भी मंडियों को ऑनलाइन करने के काम में जुटी है। इससे किसान जहां या जिस मंडी में फसल के ज्यादा दाम मिलेंगे, वहां फसल बेच सकेगा। झज्जर मंडी में भी खरीद की बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने का प्रयास सरकार करेगी।
-ओमप्रकाश धनखड़, कृषि मंत्री
बोले आढ़ती
झज्जर मंडी एशिया की सबसे बड़ी मंडी के तौर पर डेवलप की जानी थी, लेकिन अब यह सरकार की उदासीनता की मार झेल रही है। हालांकि इसके लिए उन्हें वर्ष 2006 में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट तक जाना पड़ा। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मंडी तो मिल गई, लेकिन सुविधाएं नहीं। आढ़ती केवल यहां गेहूं की खरीद पर ही टिके हैं।
-चरण सिंह दलाल, आढ़ती
झज्जर मंडी में जो भी आढ़ती हैं, वे भी रूरल बैक ग्राउंड से हैं। केवल फसलों की सरकारी खरीद पर ही टिके हैं। मंडी केवल गेहूं के सीजन में आबाद होती है। धान की खरीद की सुविधा यही नहीं है। सरकार से कई बार मंडी में सुविधाएं मांग चुके हैं, पर सुनवाई नहीं हो रही।
-अजीत यादव, आढ़ती
झज्जर मंडी में कोई भी प्राइवेट खरीदार किसानों की फसलें खरीदने नहीं आता। सरकार की इच्छा शक्ति ही नहीं है कि यहां किसानों व व्यापारियों को सुविधाएं मिले। किसानों को जहां दूर दराज की मंडियों में जाना पड़ रहा है, वहीं सरकार को आढ़त का नुकसान भी हो रहा है।
-हरेंद्र सिलाना, आढ़ती प्रधान