अमर उजाला ब्यूरो
बादली।
क्षेत्र व आसपास लगते गांवों में ईंट भट्ठों से निकलने वाला धुआं लोगों की आयु को घटाने का काम कर रहा है। भट्ठों की बढ़ती संख्या एक बड़ी चिंता का कारण है। इससे अनेक प्रकार की बीमारी तो फैल रही हैं। साथ में इस जहरीले धुआं से लोग चाह कर भी अपने आपको बचा नहीं पा रहे हैं। भट्ठों की चिमनियों से निकलता धुआं अब लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गया है। ऐसे में प्रदूषण विभाग की जांच और निरीक्षण भी सवालों के घेरे में रहती है क्योंकि अधिकत्तर भट्ठों पर प्लास्टिक और रबड़ इंधन के तौर पर प्रयोग करने के लिए बड़े बड़े ढेर लगे हैं।
क्षेत्र के गांव बूपनिया, गोयला कला, खेड़का, लाडपुर, पाहसौर, खेड़ी जट्टी और जहांगीरपुर आदि गांवों की भूमि पर 100 से ऊपर की संख्या में लगे ईंट भट्ठों की चिमनियों से दिन-रात लगातार जहरीला धुआं निकल रहा है। इसका सीधा प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लोगों को लंबे समय तक दूषित वायु में सांस लेने से कई जटिल बीमारियों से दो चार होना पड़ रहा है। यही कारण है कि श्वास एवं दमा के रोगी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि इन पर कार्रवाई न होने से इनकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
ईंट भट्ठा उद्योग में ईंधन के रूप में पदाड़ी, टायर, लकड़ी, रबड़ व कम मात्रा में कोयला आदि का उपयोग किया जाता है। इससे धुएं में कार्बन मोनोआक्साइड, कार्बन डाइआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, सल्फरडाइआक्साइड आदि जहरीले रसायन पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं। सुबह-शाम धुआं व धूल के कण मिलकर धुंध जैसा वातावरण बना देते हैं। इससे श्वसन तंत्र तो प्रभावित होता ही है। साथ में त्वचा की बाहरी परत पर प्रदूषण के प्रभाव के कारण शरीर में एलजी जैसी बीमारियां हो जाती हैं। क्षेत्र में दमा, टीबी, अस्थमा, ब्रोकाइटिस और चर्म रोग के रोगियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। सबसे अधिक परेशानी तो कस्बे में रहने वाले लोगों को हो रही है। कस्बे में पहले से ही प्रदूषण की भरमार है। ऊपर से भट्ठा की चिमनियों से निकलने वाली जहरीली हवा ने लोगों का जीना हराम कर दिया है। यदि समय रहते इन पर रोक नहीं लगाई गई तो स्वस्थ व्यक्ति को ढूंढना मुश्किल हो जाएगा।
चिकित्सकों ने भी माना गलत
इस संबंध में एसएमओ संगीता खुराना का कहना है कि प्लास्टिक और रबड़ जलाने से चिमनियों से निकलने वाले धुएं से कार्बन मोनोआक्साइड व कार्बन डाईआक्साइड निकलता है। जो मानव जीवन के साथ-साथ जीव जंतुओं को भी अपने आगोश में ले रहा है। इस जहरीले धुएं से दमा, एलजी, आंखों में जलन, सांस की बीमारी होने का खतरा सबसे अधिक है।
- ईंधन में धड़ल्ले से हो रहा है प्लास्टिक और रबड़ का प्रयोग