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12 साल बाद भी 15 हजार की आबादी को नहरी पानी का इंतजार

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चरखी दादरी। 2007 में जलघर का निर्माण कराने के बावजूद झोझू कलां गांव की 15 हजार की आबादी आज भी पेयजल संकट से जूझ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण के बाद से ही जलघर के वाटर टैंक में नहरी पानी नहीं पहुंचा है। पूरा गांव इस समय प्राइवेट सप्लाई पर निर्भर है। इसके बदले एक घर से 300 रुपये मासिक चार्ज लिया जा रहा है। खास बात यह है कि प्राइवेट सप्लाई सरकारी की तर्ज पर पाइप लाइन दबाकर की जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग के आला अधिकारियों के सामने वे समस्या रख चुके हैं। अब तक जलघर के वाटर टैंक तक नहरी पानी पहुंचाने के लिए पाइप लाइन नहीं डाली गई है।
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झोझूकलां को अब ब्लॉक का दर्जा मिल चुका है। यह जिले के बड़े गांवों में शुमार है। ग्रामीण नवीन, संदीप, प्रवीन, वेदप्रकाश, हरकिशन, बलवान, धर्मपाल, प्रकाश, पवन, सोमबीर, जोगेंद्र, मंदरूप, लीलाराम, रमेश, सोमवीर, महा सिंह व सतबीर ने बताया कि ग्राम पंचायत के प्रस्ताव पर 2007 में गांव में जलघर का निर्माण कराया गया था। जलघर निर्माण को 12 साल हो चुके हैं लेकिन अब तक वाटर टैंक में नहरी पानी नहीं पहुंचा है। ग्रामीणों ने बताया कि जलघर निर्माण के समय जो सीमेंटेड लाइन डाली गई थी उसका लेवल वाटर टैंक के लेवल से काफी नीचा था। इस कारण इस लाइन से जलघर में पानी पहुंच ही नहीं पाया। कई साल तक दूसरी लाइन डालने की मांग ठंडे बस्ते में पड़ी रही।
इसके बाद विभाग ने सुध ली और लोहे की लाइन डालने की योजना तैयार की। ग्रामीण राजबीर, अनिल, सुशील, ईश्वर सिंह, जोगेनद्र, संदीप, कृष्ण, जवजीत, टेकचंद, बजे सिंह, महाबीर, सुखबीर का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया के बाद पाइप डालने का काम तो विभाग ने शुरू कराया लेकिन इसके अंजाम तक नहीं पहुंचाया गया। ग्रामीणों ने बताया कि ठेकेदार पाइप चोरी होने की बात कहकर काम अधर में लटका कर चला गया। इसके बाद से ही पाइप लाइन डालने का काम आगे नहीं बढ़ पाया। 15 हजार की आबादी इस समय तीन बोरिंग ट्यूबवेल और प्राइवेट सप्लाई पर निर्भर है। गांव में ग्राम पंचायत ने नौ बोरिंग ट्यूबवेल लगवाए थे। इनमें से छह का पानी बेहद खारा होने के चलते पीने लायक नहीं बचा है। इस समय ज्यादातर ग्रामीण तीन ट्यूबवेलों के सहारे हैं जबकि कुछ ने प्राइवेट सप्लायर से कनेक्शन ले रखे हैं। इन घरों में प्राइवेट बोरिंग ट्यूबवेल के जरिए सप्लाई की जाती है। ग्रामीणों ने बताया कि सप्लाई दिन में एक से डेढ़ घंटे तक चलती है। इसके बदले प्रति माह तीन सौ रुपये चुकाने पड़ते हैं।
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जलघर नहीं आया वर्किंग में तो निगम ने भी उतारा ट्रांसफार्मर
झोझूकलां जलघर के निर्माण के 12 साल बाद भी वर्किंग में नहीं आ पाया है। ग्रामीणों ने बताया कि बोरिंग ट्यूबवेलों से पानी की आपूर्ति विभाग के कर्मचारी ही करते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि जलघर के अंदर बिजली निगम ने एक ट्रांसफार्मर भी रखा हुआ था लेकिन कुछ समय पहले इसे भी उतार लिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारियों ने जलघर के वर्किंग में न होने का तर्क उस समय दिया था।

ट्यूबवेल के पानी से दांतों में पीलेपन की बढ़ी समस्या
ग्रामीणों ने बताया कि बोरिंग ट्यूबवेलों का पानी अब पीने लायक नहीं है। इसका टीडीएस बहुत अधिक है। इसके चलते इसे कपड़े धोने में भी उपयोग नहीं कर सकते। ग्रामीणों ने बताया कि ट्यूबवेल के पानी का मजबूरी में इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे दांतों में पीलेपन की समस्या बढ़ रही है। इससे ग्रामीण चिंतित हैं। ग्रामीणों ने विभाग से समस्या के समाधान की गुहार लगाई है।
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ग्रामीण बोले- जलघर बनने के बाद भी नहीं मिला पानी
- गांव में 2007 में जलघर का निर्माण हुआ था लेकिन अब तक इसमें नहरी पानी नहीं पहुंचा है। 15 हजार की आबादी पेयजल संकट से जूझ रही है।
अजय कुमार, जिला पार्षद

- विभाग ने काफी समय पहले गांव में जलघर तो बनवा दिया लेकिन इसके जरिए अब तक सप्लाई नहीं की गई है। जलघर बनने का ग्रामीणों को फायदा नहीं हुआ। नवीन

- विभाग की अनदेखी से ग्रामीणों को ट्यूबवेलों का खारा पानी पीना पड़ रहा है। पूरा गांव पेयजल संकट से ग्रस्त है लेकिन समाधान नहीं किया जा रहा। संदीप

- ट्यूबवेलों का पानी खारा हो चुका है। इनका टीडीएस भी काफी अधिक है। गांव प्राइवेट सप्लाई और ट्यूबवेलों से पानी संबंधी जरूरतें पूरी कर रहा है। - प्रवीन
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