चरखी दादरी। जिले के सिविल अस्पताल और एमसीएच (मातृ-शिशु अस्पताल) में बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती की तरफ स्वास्थ्य विभाग और प्रदेश सरकार का कोई ध्यान नहीं है। बाल रोग विशेषज्ञ के तीनों पद जिले में खाली पड़े हैं। जिले में पांच वर्ष तक के बच्चों की संख्या 60452 और 14 साल तक के बच्चों की संख्या विभाग के आंकड़े अनुसार करीब एक लाख बीस हजार है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर संसाधनों की कमी के चलते परिजन बच्चों का उपचार शहर के प्राइवेट अस्पतालों में उपचार कराने को विवश है। इसके बदले प्रतिमाह उन्हें करीब 60 लाख तक चुकाने पड़ रहे हैं।
प्रदेश के सिविल अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का दम भरने वाली सरकार का चरखी दादरी जिले की तरफ ध्यान ही नहीं है। जिले में चिकित्सकों के 98 पदों में से 77 खाली पड़ी हैं। साढ़े पांच लाख की आबादी पर 22 चिकित्सक ही तैनात होने से स्वास्थ्य सेवाएं बेपटरी हैं। अगर जिले में बच्चों के सरकारी उपचार के संसाधनों की बात करें तो हालात बेहद खस्ता है। जिले में बाल रोग विशेषज्ञ के तीन पद सुसज्जित हैं और तीनों ही खाली पड़े हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों अनुसार जिले में पांच वर्ष तक के बच्चों की संख्या 60452 और 14 वर्ष तक के बच्चों की संख्या करीब एक लाख बीस हजार है। इन बच्चों के उपचार का जिले में कोई प्रबंध नहीं है। सामान्य से लेकर गंभीर बीमारी पर परिजन बच्चों को शहर या अन्य जिलों के प्राइवेट अस्पतालों में ले जा रहे हैं। वहीं, सिविल अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के अलावा दवाओं का भी टोटा है। प्राइवेट अस्पताल में उपचार के लिए पहुंचे परिजनों को दवा भी वहीं से खरीदनी पड़ती है।
यूं चुकाने पड़ते हैं प्रतिमाह 60 लाख
शहर के तीन प्राइवेट अस्पतालों की दैनिक ओपीडी करीब 90 से 100 के बीच रहती है। इस लिहाज से प्रतिदिन तीनों अस्पतालों में 300 बच्चों का उपचार किया जाता है। एक ओपीडी पर्ची का चार्ज 150 से 170 रुपये है। इस लिहाज से करीब 45 हजार रुपये प्रतिदिन ओपीडी पर्ची के चार्ज किए जाते हैं। वहीं, एक बच्चे को अगर दो सौ रुपये की दवा दी जाती है तो प्रतिदिन दवाओं का खर्च 60 हजार होता है। ऐसे में एक दिन में परिजन एक लाख पांच हजार रुपये प्रतिदिन चुकाते हैं और इस लिहाज से एक माह में 45 लाख 50 हजार का भुगतान किया जाता है। वहीं, एक ओपीडी पर्ची पर एक सप्ताह में एक बार और दिखा सकते हैं। इस दौरान ओपीडी फीस नहीं लगती जबकि चिकित्सक के कहे अनुसार परिजनों को दवा खरीदनी पड़ती है। ऐसे में प्रतिमाह यह आंकड़ा करीब 60 लाख तक पहुंच जाता है।
बाल नर्सरी तक की नहीं जिले में सुविधा
चरखी दादरी जीएच और एमसीएच में बाल नर्सरी ही नहीं है। डिलीवरी के बाद बच्चे को कई दफा बाल नर्सरी में एक माह तक भी रखना पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में परिजनों के लिए प्राइवेट अस्पतालों की बाल नर्सरियां ही सहारा बनती हैं। यहां एक दिन के करीब 800 से एक हजार रुपये तक चार्ज किए जाते हैं। बाल नर्सरी की जिले में बेहद कमी खल रही है लेकिन अब तक स्वास्थ्य विभाग ने यह कमी दूर नहीं की है।गरीब तबके के लोग प्राइवेट नर्सरियों का चार्ज चुकाने में असमर्थ रहते हैं।
परिजन बोले: मजबूरी में आते हैं प्राइवेट अस्पताल
- सिविल अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ नहीं है। बच्चों के खून का सैंपल लेने की भी व्यवस्था नहीं है। परिजनों को मजबूरीवश निजी अस्पतालों में जाकर महंगा उपचार कराना पड़ता है।
अजय, सांवड़ निवासी
- सरकारी अस्पतालों में बच्चों के लिए सुविधाएं नहीं हैं। गरीब तबके के लोगों के लिए बच्चे का प्राइवेट उपचार करना संभव नहीं है। सरकार को चिकित्सक की तैनाती करनी चाहिए।
लीला देवी, कमोद निवासी
स्टाफ की कमी से संबंधित जिले के आंकड़े
पांच साल तक के बच्चों की संख्या- 60452
14 साल तक के बच्चों की संख्या- 1.20 लाख
बाल रोग विशेषज्ञ की सेंशन पोस्ट- 03
बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती- 00
स्टाफ नर्सों की सेंशन पोस्ट- 100
स्टाफ नर्सों के खाली पद- 63
एलटी की सेंशन पोस्ट- 33
एलटी की खाली पोस्ट- 25
बाल रोग विशेषज्ञ की डिमांड हमने हेड ऑफिस भेज रखी है। जल्द ही बाल नर्सरी की सुविधा मुहैया करवा दी जाएगी और इसके लिए हम प्रयासरत्त है।
विरेंद्र यादव, सीएमओ, चरखी दादरी