अमर उजाला ब्यूरो
झज्जर।
प्रदेश सरकार की मुख्य फ्लैगशिप योजना को लागू करवाने में झज्जर जिला प्रशासन पूरी तरह से नाकाम साबित हुआ है। झज्जर शहर को ओडीएफ व स्ट्रे कैटल फ्री अभियान के लिए प्रशासन के द्वारा 25 सितंबर तक डेडलाइन रखी गई थी। लेकिन प्रशासन इस दौरान पूरा कार्य पूरा करने में नाकाम रहा है। ऐसा नहीं है कि ये पहली बार डेडलाइन तय की गई हों। इस प्रकार की डेडलाइन जून में माह में रखी जानी शुरू की गई थी, जिसे आगे खिसकाते हुए जिला प्रशासन अब अक्तूबर माह के करीब पहुंच चुका है। साल के शुरू में इन महत्वपूर्ण योजना को पूरा करने के लिए जोर लगाना शुरू किया था। लेकिन नपा में बदलते अधिकारियों व अंदरूनी राजनीति ने इसे सिरे चढ़ने से रोक दिया। वहीं स्वच्छता सर्वेक्षण में भी झज्जर शहर कुछ खास करता हुआ नजर नहीं आ रहा क्योंकि इस बारे में कोई खास प्लानिंग अभी तक नपा के द्वारा नहीं की गई है।
गली-गली घूम रहे हैं लावारिस पशु
स्ट्रे कैटल फ्री अभियान में नपा के द्वारा दावा किया जा रहा है कि उनके द्वारा सभी लावारिस पशु पकड़े जा चुके हैं। लेकिन हकीकत में अब भी गली-गली में लावारिस पशु घूम रहे हैं। जिस पर नपा की दलील है कि गांवों से फिर लावारिस पशुओं को शहर की तरफ भेजा जा रहा है। वहीं हकीकत तो ये भी है कि पशुपालन विभाग के द्वारा टैग लगे लावारिस पशु सड़कों पर दिख रहे हैं। जिस पर नपा की दलील है कि गोशाला के द्वारा कुछ खूंखार लावारिस पशुओं को छोड़ दिया जाता है। क्योंकि वे गोशाला में बंद दूसरे पशुओं को नुकसान पहुंचाते हैं। खैर नपा के दावे चाहे जो भी हैं लेकिन अमर उजाला ने डेडलाइन खत्म होने पर अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में पाया कि प्रशासन अभियान को सिरे चढ़ाने में पूरी तरह फेल रहा।
मोबाइल टॉयलेट तक नहीं हुए चालू
शहर को ओडीएफ बनाने का टारगेट लेकर चल रहा प्रशासन शहर में लगे मोबाइल टॉयलेट तक चालू नहीं करवा सका है। शहर में 12 स्थानों पर नपा के द्वारा मोबाइल टॉयलेट लगवाए गए हैं लेकिन एक को छोड़कर बाकी में अभी तक पानी के कनेक्शन तक नहीं हैं। जिसके चलते करीब 25 लाख रुपये की कीमत वाले ये मोबाइल टॉयलेट यूजलेस हो गए हैं। इस प्रकार से शहर को ओडीएफ बनाने का सपना टूटता हुआ नजर आ रहा है। वहीं शहर में काफी लोग अभी ऐसे बचे हुए हैं, जिनके टॉयलेट की फाइल नपा कार्यालय में फंसी हुई है। ऐसे लोग टॉयलेट बनवाने के लिए सरकारी ग्रांट का इंतजार कर रहे हैं।
वर्जन
शहर में अब तक 497 लावारिस पशु पकड़े जा चुके हैं। गांवों से फिर लावारिस पशु शहर में छोड़ दिए जाते हैं। जिसके चलते वे सौ फीसदी कार्य पूरा नहीं कर पा रहे। टॉयलेट रखरखाव का टेंडर करने के लिए फाइल डीसी कार्यालय भेजी जा चुकी है। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद टेंडर छोड़ कर कार्य शुरू करवा दिया जाएगा।
- नरेंद्र सैनी, सचिव, झज्जर।
- लावारिस पशु पकड़ने में रहे नाकाम तो शौचालय की सुविधा नहीं करवा पाए उपलब्ध