अभी प्रदूषण बढ़ाने का प्रमुख कारण बताई जा रही पराली जल्दी ही बेशकीमती होने वाली है। ऐसा होगा पराली से कम्प्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) बनाने की फैक्टरी लगने से। हिसार जिले के डाटा व चौधरीवास गांव में लगने वाली इन फैक्टरियों का काम तेजी से चल रहा है। उम्मीद है कि मार्च से पहले इनका काम पूरा हो जाएगा। डाटा गांव में लग रहे प्लांट में हानिरहित डीएपी खाद भी बनाई जाएगी। इससे खेती में रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग कम होगा।
जिले में एक लाख 87 हजार एकड़ क्षेत्रफल में धान की खेती होती है। अक्तूबर में धान की फसल कटने के तुरंत बाद ही खेत में सरसों व गेहूं की बिजाई के कारण किसानों को धान की पराली जल्द निकालनी होती है। खेत को खाली करने के लिए किसान एकत्रित पराली को जला देते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में प्रदूषण होता है।
औद्योगिक इकाइयों व वाहनों से निकले धुएं से पहले से परेशान लोगों को पराली का धुआं और अधिक तकलीफ देता है। इस प्रदूषण को कम करने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में अब पराली से सीबीजी (कम्प्रेस्ड बायो गैस) बनाने की शुरुआत हो रही है। हिसार जिले के डाटा व चौधरीवास गांव में इससे संबंधित प्लांट लगाए जा रहे हैं।
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हर दिन चाहिए 120 टन पराली
डाटा गांव में फैक्टरी लगा रहे राजेश व सुमित बताते हैं कि यहां प्रतिदिन तीन हजार केजी कम्प्रेस्ड बायो गैस उत्पादित होगी। हिंदुस्तान पेट्रोलियम गैस कंपनी यह गैस खरीदकर अपने पंप से इसका वितरण करेगी। प्लांट के लिए पराली की खरीद ग्राम पंचायतों के माध्यम से होगा।
किसानों से पंचायत तक पराली खरीदकर एकत्रित करेंगी और उनसे हम खरीद लेंगे। सुमित ने बताया कि हमारे प्लांट में 50 टन प्रतिदिन डीएपी का भी उत्पादन होगा। इस डीएपी में हानिकारक रसायनों की जगह पराली, गोबर और प्रेसमड (चीनी मिल में निकलने वाले गन्ने का अपशिष्ट) का प्रयोग किया जाएगा।
रोजगार के साथ गोबर से भी होगी आय
पराली से सीबीजी बनाने की प्रक्रिया में 50-60 लोगों की जरूरत होगी। इसके अलावा ग्रामीण इलाके से पराली की खरीद व यहां तैयार गैस व डीएपी की बिक्री में भी लगभग 30-40 लोग लगेंगे। इस तरह से एक प्लांट के संचालन में लगभग 100 लोगों को प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिलेगा। इतना ही नहीं किसानों को खेत की पराली के अलावा पशुओं के गोबर से भी अतिरिक्त आय होगी। किसानों को प्राकृतिक विधि से बनाई गई डीएपी मिलेगी, जिसके प्रयोग से मृदा स्वास्थ्य में भी सुधार आएगा।
यह है सीबीजी तकनीकि
डाटा गांव में प्लांट लगाने वाले सुमित महाराष्ट्र के कोल्हापुर में दो साल की ट्रेनिंग ले चुके हैं। वे बताते हैं कि यह गोबर गैस बनाने की पुरानी तकनीकि का ही वर्धित स्वरूप है। इसमें पराली की कटिंग करके पिट (गड्ढा) में डालेंगे। फिर उसे डायजेस्टर में भेजेंगे। वहां इसे बायो गैस में तब्दील किया जाएगा। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में मिथेन गैस निकलती है। इस मिथेन गैस को प्यूरीफाई करने के बाद कम्प्रेस्ड करके सिलिंडर में भरा जाता है। हरियाणा में रोहतक में एक प्लांट है, जो चालू हालत में है। प्रदेश में करीब 100 प्लांट इस तरह के लग रहे हैं।