माई सिटी रिपोर्टर
हिसार। भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए 1857 की क्रांति हो या 1947 की लड़ाई, देश के हर हिस्से से क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत दी थी। कुछ क्रांतिकारी गांव ऐसे थे, जिन्हें देशभक्ति की कीमत गांव को खोकर चुकानी पड़ी। 21 अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के बाद हिसार जिले के रोहनात गांव को अंग्रेजों ने नीलाम कर दिया था। हांसी से 12 किलोमीटर दूर स्थित गांव के लोगों को आज तक उनकी जमीन नहीं मिली।
गांव के लोग हरियाणा के बनने से पहले से लेकर आज तक नेताओं के दरबार के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं। ग्रामीण बताते हैं कि उनकी मांगें नहीं मानने के विरोध में आजादी के बाद भी गांव के लोगों ने कभी स्वतंत्रता या गणतंत्र दिवस नहीं मनाया। 2018 में प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के निवेदन पर गांव में पहली बार तिरंगा फहराया गया था।
क्रांतिकारियों ने लूट लिया था तोशाम का सरकारी खजाना
ग्रामीण बताते हैं कि 29 मई 1857 को विद्रोह होने पर गांव के क्रांतिकारियों ने तोशाम पर हमला कर दिया था और यहां से सरकारी खजाना लूट लिया था। जेलें तोड़ कैदियों को भगा दिया गया था। इस दिन हुए विद्रोह में हांसी के रोहनात गांव के अलावा आस-पास के कई गांव के लोगों ने हांसी छावनी पर हमला कर दिया, जिसमें 11 अंग्रेज अफसर मारे गए। क्रांतिकारियों की जीत और उत्साह को देखकर गांव से अन्य लोग भी क्रांति में शामिल हो गए, जिन्होंने हिसार में भी अंग्रेजों पर हमला कर 12 अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया था। इस क्रांति में बड़ी संख्या में रोहनात के क्रांतिकारी शामिल थे।
गांव के 14 क्रांतिकारियों को हांसी में पीसा गया
ग्रामीण बताते हैं कि 1857 के विद्रोह का बदला अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को चुन-चुन कर लिया था। पुट्ठी मंगलखां पर तोप लगाकर रोहनात गांव को तबाह कर दिया गया। जमालपुर, हाजमपुर, भाटोल रांगडान, खरड़ अलीपुर और मंगाली को अंग्रेजों ने आग लगा दी थी। इसके बाद क्रांतिकारी पकड़ कर हांसी लाए गए और बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को सड़क की रोड़ी कूटने वाले रोड रोलर से पीस दिया गया। इसमें गांव रोहनात के क्रांतिकारी नौंदा राम भी शामिल थे। यह सड़क रक्त से लाल हो गई थी, जिस कारण इसका नाम लाल सड़क पड़ा। इस दौरान गांव के क्रांतिकारी बिरड़दास स्वामी को तोप से उड़ा दिया गया था।
नीलामी में 61 खरीदारों ने खरीदा था गांव
इस घटना के बाद अन्य कुछ गांवों के साथ गांव रोहनात को भी नीलाम कर दिया गया। पूरे गांव की 20 हजार 656 बीघे धरती और मकान अंग्रेजों ने नीलाम कर दिए। उमरा गांव के 29, सुल्तानपुर के 20, महंदीपुर के 1, भगाना के 7, मजाहदपुर के 4 सहित कुल 61 लोगों ने गांव को खरीद लिया था।
हमारे पूर्वजों ने देश के लिए बलिदान दिया था और अंग्रेजों ने हमारी जमीन नीलाम कर दी थी। लेकिन आजादी के बाद भी दुर्भाग्य से गांव को कुछ नहीं मिला। 1964 में संयुक्त पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों को 57 प्लाट देने की घोषणा की थी, लेकिन कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। 1970 में गांव को सवा लाख रुपये मुआवजा दिया गया, लेकिन ग्रामीणों ने मना कर दिया क्योंकि यह 78 लाख बनता था।
- धर्मबीर सिंह, ग्रामीण
देश को आजादी मिली, लेकिन रोहनात गांव आर्थिक तौर पर आज तक आजाद नहीं हुआ। अंग्रेेजों ने हमारी जमीनें नीलाम कर दी थीं। स्वतंत्रता के बाद से ही हम क्षतिपूर्ति की मांग कर रहे हैं, लेकिन कुछ नहीं मिला। 2018 में मुख्यमंत्री मनोहर लाल के आश्वासन पर गांव में पहली बार आजादी का जश्न मना और तिरंगा लहराया गया, लेकिन उनका आश्वासन कोरा साबित हुआ।
- रिसाल सिंह बूरा, ग्रामीण
रिसाल सिंह बूरा- फोटो : Hisar
रोहनात गांव का मुख्य द्वार। संवाद- फोटो : Hisar