हिसार- चिराग अपने परिजनों के साथ
- फोटो : Hisar
हिसार। रूस-यूक्रेन जंग में यूक्रेन में फंसे भारतीय विद्यार्थियों का स्वदेश लौटना जारी है। सकुशल घर लौटने पर विद्यार्थियों की आपबीती सुनकर परिजनों की आंखें भी नम हो रही हें। विद्यार्थी अभी भी घबराए हुए हैं। जोर की आवाज सुनकर बच्चे सहम जाते हैं। रामनगर के चिराग ने बताया कि अब भी कानों में बमबारी की आवाजें गूंज रही हैं। लवीव पहुंचने पर रेलवे स्टेशन पर गुजारी रात। वहीं विद्यार्थियों को अब अपनी पढ़ाई की चिंता भी सताने लगी हैं। विद्यार्थियों ने बताया कि यूक्रेन में लगातार बमबारी हो रही है। दहशत और मुश्किल के वक्त में हिम्मत जुटाई तो आज अपनों के पास हैं। यूक्रेन में भारतीय दूतावास से कोई मदद नहीं मिल पाई, मगर बॉर्डर पार करने के बाद दूतावास की मदद से ही वतन लौटे हैं।
थोड़ी दूरी पर गिर रहे थे बम
रामनगर के रहने वाले चिराग ने बताया कि यूक्रेन शहर के कीव से एमबीबीएस कर रहा हूं। गत 24 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। खारकीव और कीव को पहले निशाना बनाया गया। 24 से ही कीव में बमबारी होने लगी। रात के समय बमबारी होती थी। सायरन बजते ही हमें बंकर के अंदर भेज दिया जाता। बम धमाकों और फाइटर जेट की आवाजें सुनाई देती। दिन के समय दिखाई देता था कि हॉस्टल से कुछ दूरी पर ही बमबारी हो रही है। 28 फरवरी को हिम्मत की और करीब 80 बच्चे बंकर से बाहर निकले। 14 किलोमीटर का पैदल सफर तय करने के बाद रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। यहां से लवीव के लिए ट्रेन मिली।
चिराग ने बताया कि लवीव पहुंचे के बाद एक रात रेलवे स्टेशन पर गुजारनी पड़ी। रात भर बम धमाकों की आवाजे सुनाई देती रही। सुबह एक ट्रेन मिस हो गई। उसके बाद हंगरी बॉर्डर के लिए ट्रेन मिली। वहां के स्थानीय लोग काफी परेशान कर रहे थे। काफी सफर खड़े होकर तय किया। उसके बाद दो हंगरी बॉर्डर पहुंचने के बाद दो दिन यहां पर लाइन में लगे। उसके बाद वीजा मिला। बॉर्डर पार करने के बाद भारतीय दूतावास ने वहीं पर रुकने और खाने पीने की पूरी व्यवस्था थी।
पेट खाली, जान के थे लाले : स्वीजी
बास। यूक्रेन में चल रहे युद्ध के कारण हजारों भारतीय वहां फंस गए थे। भारत सरकार की मदद से गांव बास से स्वीटी व विक्रम भी अपने घर लौट आए हैं। घर लौटने पर स्वीटी की माता ने अपनी बेटी को तिलक किया और उनकी लंबी आयु की प्रार्थना की। स्वीटी ने बताया कि वह हमले के समय कीव में थी। सायरन की आवाज सुनते ही हॉस्टल के बंकर में जाकर दुबक गए। तीन दिन तक वहीं रहे। हर पल मौत नजर आ रही थी। खाने का सामान भी खत्म हो गया था। जिंदगी में ऐसा पहली बार हुआ था कि पेट खाली था और ऊपर से जान के लाले थे।
उसके बाद सभी छात्र अपने खर्चे से एक प्राइवेट बस से बॉर्डर पहुंचे। यहां पर 2 दिन रहने के बाद वतन वापसी की आस जगी। जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरे तो मन में यह हुआ कि अब तो बच गए। घर पहुंची तो अपनों को देख आंखों में आंसू रोक नहीं पाई। स्वीटी के पिता कर्मवीर ने बताया कि सरकार को हमारे देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ानी चाहिए और जो फीस ली जा रही है उसमें कटौती की जानी चाहिए। संवाद