सिवानी मंडी। श्रीराम की लीलाओं से सजी सिवानी की धरती इस बार एक बड़े संकट से जूझ रही है। 1981 से सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा की नींव बन चुका श्रीराम नाटक क्लब इस बार रामलीला मंचन के लिए स्थल की कमी से परेशान है। नवरात्र में पूरा सिवानी शहर दुल्हन की तरह सजता है। घर-घर, गली-गली से रामधुन गूंजती है। मंदिरों में पूजा, घरों में व्रत और मंच पर रामलीला हर ओर भक्ति और संस्कारों का संगम दिखाई देता है, लेकिन इस बार शहर के सबसे बड़े धार्मिक मंच को ही जगह नहीं मिल रही।
ये मंच मेरा परिवार है
हिसार निवासी कृष्णा अग्रवाल 2013 से श्रीराम नाटक क्लब से जुड़े हैं। भारत, मेघनाद, राजा जनक, लक्ष्मण जैसे कई पात्र निभा चुके हैं। बीते दो वर्षों से वह प्रभु श्रीराम की भूमिका में नजर आते हैं। उनका कहना है कि मैं व्यापारी हूं, लेकिन साल में ये 9 दिन मेरी आत्मा का पर्व है। मेरे चाचा विनोद गोयल सुग्रीव और मारीच का पात्र निभाते थे, उनके भाई कौशल्या माता का पात्र निभाया। ये केवल मंच नहीं हमारी विरासत है।
ये अभिनय नहीं, आत्मा की साधना है
गांव नलोई निवासी नेशनल अवॉर्डी मनोज जांगड़ा 2021 से रामलीला मंच से जुड़े हैं। वे हास्य पात्र निभाते हैं, लेकिन कहते हैं कि जब पहली बार मंच पर आया तो लगा जैसे कोई शक्ति मुझे संचालित कर रही हो। दर्शकों की आंखों में आंसू, चेहरे पर मुस्कान यह मंच अभिनय नहीं अध्यात्म है।
यह मंच कलाकारों की तपस्या का फल है
राजस्थान सीमा से सटे गांव झुंपा निवासी युवा उद्योगपति मोनू गोदारा 2020 से क्लब से जुड़े हैं। 2019 में पहली बार रामलीला देखी। कुछ कलाकारों को देखा जो 9 दिन जमीन पर सोते हैं, कुछ दिनभर मौन रहते हैं ताकि पात्र में पूरी तरह उतर सकें। ये मंच मंदिर से कम नहीं है। मेरा गांव 18 किलोमीटर दूर है, लेकिन हर साल मैं पूरे परिवार सहित यहां आता हूं।
भाईचारे की मिसाल है मंच
2014 से जुड़े युवा उद्योगपति केशव जिंदल बताते हैं कि रामलीला के अंतिम दिन सभी कलाकार एक साथ भोजन करते हैं। 200 से ज्यादा लोग एक पंक्ति में बैठते हैं। ये कोई नाटक नहीं, एक परिवार है, जो प्रभु श्रीराम के नाम पर जुड़ा है।
तीन पीढ़ियों की सेवा
प्रदीप वशिष्ठ, 1997 से रामलीला से जुड़े हैं। उनके पिता स्वर्गीय पवन शर्मा 1981 में क्लब की स्थापना से जुड़े थे। मंच सज्जा, पर्दे, बैकस्टेज सभी व्यवस्थाएं उन्हीं के भरोसे थी। मेरे पिता मंच सजाते थे। अब मैं करता हूं और मेरा बेटा सनी उर्फ धोनी भी यही सेवा निभा रहा है। ये हमारे परिवार की साधना है, और इसमें हमें गर्व है कि हम श्रीराम की लीला का हिस्सा बनते हैं।
पिता-पुत्र की सेवा
1998 से जुड़े इंद्र कुमार खटक रामलीला की लाइटिंग व्यवस्था संभालते हैं। उनका बेटा अमन खटक भी वालंटियर के रूप में साथ देता है। दोनों निस्वार्थ सेवा में जुटे रहते हैं। हर वर्ष मंच की रोशनी से पहले हमारे भीतर की आस्था जलती है। यही हमें शक्ति देती है।
रामलीला ने मेरी जिंदगी बनाई
क्लब के कोषाध्यक्ष गौरव शर्मा ने कहा कि बचपन में छोटी सी भूमिका भी मिलती थी तो लगता था भगवान का आशीर्वाद है। अब मैं राक्षस राज दूषण, मारीच, शत्रुघ्न, कामदेव जैसे पात्र निभा चुका हूं। सबसे पहले टेंट भी यहीं से लगाया था और आज व्यवसाय में जो सफलता है उसका श्रेय मैं प्रभु श्रीराम को देता हूं।