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Hisar News: यूपी के चार, उत्तराखंड व राजस्थान के तीन घोड़ों में मिले ग्लैंडर्स के लक्षण

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हिसार। घोड़ों में होने वाली जानलेवा बीमारी ग्लैंडर्स का प्रभाव बढ़ रहा है। यूपी के श्रावस्ती जिले के चार, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के तीन व राजस्थान के झुंझुनू जिले के तीन घोड़ों में इस बीमारी के लक्षण पाए गए हैं। किट से आरंभिक जांच के बाद इन सभी 10 घोड़ों के सैंपल जांच व पुष्टि के लिए अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार को भेजा गया है। शुक्रवार तक इनकी रिपोर्ट आने की संभावना है।
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ग्लैंडर्स बीमारी को लेकर इस बार राजस्थान व उत्तराखंड काफी संवेदनशील है। वजह यह कि गायों में हुई लंपी बीमारी के चलते इन राज्यों में घोड़ों में ग्लैंडर्स की जांच काफी कम हुई है। राजस्थान के झुंझुनू व जयपुर समेत कई जिलों में इस बीमारी से ग्रसित पशु मिल भी चुके हैं। अब झुंझुनू के उसी अश्व पालक के तीन अन्य घोड़ों में भी बीमारी के लक्षण मिले हैं। इसके अलावा उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में भी तीन घोड़ों में आरंभिक लक्षण मिले हैं। दोनों जगह से बीमारी की पुष्टि के लिए सैंपल अश्व अनुसंधान केंद्र को भेजा गया है। इसके अलावा यूपी के श्रावस्ती जिले में चार घोड़ों में इस बीमारी के लक्षण पाए गए हैं। वहां से भी सैंपल जांच के लिए हिसार आया है।
अश्व अनुसंधान केंद्र (एनआरसीई) हिसार के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हरिशंकर सिंघा बताते हैं कि कई बार राज्य सरकारों को घोड़ों की वृहद जांच के लिए पत्र भेजा जा चुका है। लेकिन, पशुपालन विभाग ने जांच काफी कम कराई है। जिन घोड़ों में बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी है, उनके पालक ही अपने घोड़ों की जांच करा रहे हैं।
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जींद, सिरसा, रोहतक में भी मिले चुके हैं संक्रमित घोड़े
पिछले सप्ताह ही जींद जिले के एक घोड़े में ग्लैंडर्स के लक्षण मिले थे, जिसके बाद वहां से जांच के लिए 10 अन्य सैंपल भी लिए गए थे। हालांकि अभी सैंपल की रिपोर्ट आनी बाकी है। इसके अलावा सिरसा व रोहतक समेत कई अन्य जिलों में भी इस बीमारी से ग्रसित पशु मिल चुके हैं। ग्लैंडर्स घोड़ों से इंसानों में फैलने वाली बीमारी है, इसीलिए इस तरह के मामले सामने आने के बाद संक्रमित पशु को मारकर दफना दिया जाता है।
25 हजार रुपये मिलते हैं पशुपालक को
जिन घोड़ों में ग्लैंडर्स की पुष्टि होती है, उन्हें मारकर दफना दिया जाना ही एकमात्र विकल्प है। इससे अश्व पालक को जो क्षति होती है, उसकी भरपाई के लिए सरकार की तरफ से 25 हजार रुपये दिए जाते हैं। अश्व अनुसंधान केंद्र से बीमारी की पुष्टि के बाद इसकी रिपोर्ट संबंधित जिले के पशुपालन विभाग को भेजी जाती है। पशुपालन विभाग के अफसर मनुष्य जीवन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संक्रमित पशु को मारने व सुरक्षित तरीके से दफनाने की प्रक्रिया पूरी कराते हैं।
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