हिसार से कैमरी जाने वाले रास्ते के दायीं तरफ बने शैशव कुंज के हालात पिछले तीन दिन से बदले हुए हैं। पहले यहां जितने बच्चे रहते थे, उनमें 46 और शामिल कर दिए गए।
संख्या बढ़ते ही यहां हालात खराब हो गए है। जैसे-तैसे करके समाजसेवियों की मदद से व्यवस्था बनाई गई है। यहां प्रणामी बाल आश्रम से लाए गए बच्चों में से दो को डायरिया हो गया है। खारा पानी पीने के कारण उनको उल्टी-दस्त हो गए। वीरवार को ही आश्रम पदाधिकारी उन्हें चिकित्सक के पास लेकर गए।
चार दिन बाद फिर से परीक्षा
प्रणामी आश्रम से यहां तीन महीने से लेकर 18 साल तक के बच्चों को लाया गया था। इनमें से लड़कों को बाल भवन भेज दिया गया।
अब लड़कियां यहां बची हैं। उनमें चार दिन बाद होने वाली परीक्षाओं को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसे माहौल में ना तो परीक्षा की तैयारी कर पा रही हैं और ना ही उनके पास पूरे संसाधन हैं। छोटे-छोटे बच्चों की जिंदगी सात एकड़ की खुली हवा से 500 गज के दायरे में बंध गई है। सभी बच्चे आश्रम में वापस जाने की रट लगाए हुए हैं।
10वीं में पढने वाली वीना बताती है कि उस दिन शाम को करीब 4 बजे उन्हें आश्रम से पकड़-पकड़कर निकाला गया। वहां साइन करवाकर वापस छोड़ देने की बात कही गई थी।
मगर यहां लाकर छोड़ दिया गया। वहां तो कमरों में एसी तक लगा हुआ था, अब एक कमरे में छह लड़कियां एक पंखे के नीचे सो रही हैं।
11वीं की छात्रा राधा ने बताया कि उसकी कल अंग्रेजी की परीक्षा थी। जिसे वो नहीं दे पाई। अब चार दिन बाद भी पेपर है। मगर ना कोई तैयारी हो पा रही है और ना ही ध्यान परीक्षा पर लग रहा है। अब तो उम्मीद भी नहीं है कि चार दिन बाद परीक्षा दे पाऊंगी। बस हमें तो वापस आश्रम ही जाना है।
11वीं की ही छात्रा गीता ने बताया कि उसका इकोनोमिक्स का पेपर था, जो वो नहीं दे पाई। वो अधिकारी मैडम जब आश्रम से लेने आई तो उन्हें थप्पड़ मारकर बाहर निकाला गया।
वापस आश्रम में छोड़ने की बजाए उन्हें यहां कमरों में बंद कर दिया गया। काफी देकर तक रोते रहे, चिल्लाते रहे, लेकिन किसी ने भी एक नहीं सुनी।
हम कोशिश कर रहे हैं कि बच्चों को कोई परेशानी ना आए। मगर उनकी पढ़ाई बाधित जरूर हो रही है। हमारे पास भी ज्यादा बच्चों के लिए संसाधन नहीं थे। प्रशासन को संसाधन उपलब्ध करवाने के लिए लेटर लिखा है। दो बच्चों को डायरिया हो गया था, जिन्हें चिकित्सक के पास ले जाया गया। - पंकज संधीर, संरक्षक, शैशव कुंज