रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी में फंसे दो आरोपियों को मिली जमानत को खारिज कराने के लिए अदालत में याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मनमोहन राय सेशन जज अरुण कुमार सिंगल की कोर्ट की अदालत में याचिका दायर की है।
मनमोहन राय ने कहा कि अदालत ने तीन आधार पर अरुण खुराना, पार्थ खुराना की जमानत याचिका स्वीकार की थी, जिसमें लिखा कि आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 का अपराध नहीं बनता, बाकी सभी अपराधों की सजा 7 साल से कम है और इस समय कोविड-19 महामारी चल रही है। इसके जवाब में याचिका में लिखा है कि आरोपियों ने एक टीके को उसकी असली कीमत के कई गुणा ज्यादा दाम वसूले और उसका कोई बिल भी नहीं दिया, जिससे उनको अनुचित लाभ हुआ और दूसरे पक्ष को अनुचित हानि हुई जो भारतीय दंड संहिता की धारा 420 का अपराध बनाती है। इसके अलावा ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के मामले की सुनवाई सत्र न्यायालय में होती है, जिस पर विद्वान मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत को संज्ञान लेने का कोई अधिकार नहीं है।
इस एक्ट की धारा 36-एडी में विशेष तौर पर लिखा गया है कि आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों, जिसमें जमानत व बोंड आदि शामिल हैं, के कार्य विशेष अदालत के समक्ष ही होंगे और विशेष अदालत सत्र न्यायाधीश की होगी। ऐसे में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत को इस एक्ट के तहत जमानत लेने का अधिकार ही नहीं है। बता दें 1 मई को स्टिंग आप्रेशन के जरिये अरुण खुराना, पार्थ खुराना को रेमडेसिविर ब्लैक करने के आरोप में पकड़ा गया था। स्टिंग ऑपरेशन करने वाले एवं मामले के चश्मदीद गवाह दोनों ने याचिका में कहा है कि उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर यह स्टिंग ऑपरेशन किया। स्टिंग के दौरान संक्रमित होने का खतरा था।