उपेक्षा की शिकार है साइट
पांच हजार साल पुरानी हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़ी पुरातात्विक साइट पहली नजर में आपको मिट्टी के टीले सी ही नजर आएगी। करीब जाने पर इसकी ऐतिहासिकता का अहसास होगा। मानव कंकाल, मटके, मर्तबान, ईंटें, चूड़ियां, गले में पहने जाने वाले मणके आदि को देखकर आप समझ सकते हैं कि धरती से निकला विरासत का यह खजाना कभी समृद्ध नगरी के रूप में गुलजार रहा होगा। साइट आरजीआर-1 से 7 के बीच मिली यह धरोहर संरक्षित तो है मगर उपेक्षा की भी शिकार है। उत्खनन में मिले पुरावशेष यत्र-तत्र बिखरे हैं। जिन साइट पर खोदाई चल रही है, वहां संरक्षण की कोई आधुनिक तकनीक नहीं है। इसके अभाव में माटी से मिले हड़प्पन सभ्यता के प्रमाण मिट्टी हो रहे हैं।
राखीगढ़ी में अब तक सात साइटों पर हड़प्पन सभ्यता के प्रमाण मिल चुके हैं, जिन्हें राखीगढ़ी (आरजीआर) -1 से 7 का नाम दिया है। हालांकि, दावा 11 साइट की खोज का है। साइट -1 और 3 पर खोदाई चल रही थी, जो वर्तमान में लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं होने से बंद है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग के चंडीगढ़ सर्कल ने 13 जनवरी से काम रोक दिया है। एएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. संजय मंजुल शीघ्र ही खोदाई शुरू होने का दावा कर रहे हैं।
अब तक क्या-क्या प्रमाण मिल चुके
आरजीआर-5 का उत्खनन बताता है कि इस क्षेत्र में कभी सर्वाधिक घनी आबादी थी। इस समय भी इस साइट पर आबादी बसी है। इसलिए यहां ज्यादा खोदाई संभव नहीं है, लेकिन आरजीआर-4 के कुछ भागों में खोदाई हो सकती है। इसके कुछ हिस्से पर मकान भी बने हैं। आरजीआर-1, 2 और 3 के नीचे बड़ी आबादी के प्रमाण मिल चुके हैं। आरजीआर-7 में मानव कंकाल मिला, जिसे साइट-1 पर बनाए एक अस्थायी कमरे में रखा गया है। आरजीआर-7 के पास नदी होने के प्रमाण मिले हैं। माना जाता है कि यह नदी करीब पांच हजार वर्ष पहले सूख गई थी। उत्खनन में ईंटों से बनी सीवेज लाइन, मिट्टी की मूर्तियां, पीतल की कलाकृतियां, पीतल और सुइयों से बने मछली हुक, कब्रिस्तान, टेराकोटा चूड़ियां, शंख, आभूषण (जिनमें से कुछ 5,000 साल से अधिक पुराने हैं) मिल चुके हैं। दुर्ग-प्राचीर, अन्नागार, सड़कें, जल निकासी व्यवस्था, स्तम्भ युक्त वीथिका या मंडप, ऊंचे चबूतरे पर बनाई गईं अग्नि वेदिकाएं, खेल स्टेडियम इस नगर के समृद्ध और विकसित होने का संकेत देते हैं।
जानिए अब कहां क्या है स्थिति
साइट-1
फिलहाल यहां खोदाई का काम बंद है। टीले पर खोदाई स्थल को पॉलिथीन से ढक दिया गया है। पास ही इससे पहले की गई खोदाई के स्थल को भी पॉलिथीन से ढका गया था। यह जगह मिट्टी से अट चुकी। इस जगह पॉलिथीन के कुछ अवशेष ही नजर आते हैं। इसी साइट पर श्मशान गृह बना है, जहां गांव के लोग अब भी अंतिम संस्कार करने आ रहे हैं। बावजूद इसके कि पंचायत ने श्मशानघाट के लिए अलग जगह भी दे रखी है। इसी साइट पर बनाए एक अस्थायी कमरे में पुरावशेष रखे हैं। इनमें मिट्टी के घड़े, बर्तन, चूड़ियां, आभूषण, सजावटी सामान, मानव कंकाल, पत्थर आदि हैं। अधिकतर सामग्री बिखरी है, तो कुछ कट्टों में भरकर रखी गई हैं। कुछे को शीशे के शोकेस में सजा भी रखा है।
साइट-2
अतिक्रमण की भरमार है। लोगों ने पशु बांध रखे हैं। महिलाएं उपले थाप रही हैं। एएसआई की ओर से की गई चहारदीवारी की रेलिंग पर कपड़े सूख रहे हैं। आसपास गंदगी के ढेर हैं। हालांकि, जितनी जगह में यहां खोदाई की गई है, उसे शेड से ढका गया है। निगरानी में एक पुलिसकर्मी भी तैनात है।
साइट-3
खोदाई में मिले पक्के निर्माण, गलियां, कुआं, चूल्हे, सीढ़ियां आदि साफ नजर आते हैं। इसे भी शेड से कवर किया गया है। यहां एक साथ बने तीन चूल्हों के पास मानव कंकाल के अवशेष दफन हैं। इससे कुछ ही दूरी पर एक दीवार से सटी सीढि़यां दिखती हैं। इस साइट पर एक मजार भी बनी है, जिस पर लोग मन्नत मांगने आते हैं। अतिक्रमण यहां भी है।
साइट-4
यहां खोदाई हुए लंबा समय बीत चुका है। अब पूरी साइट पर अतिक्रमण हो चुका है। जब तक यहां से लोगों को विस्थापित नहीं किया जाएगा, आगे खोदाई संभव भी नहीं है। इस टीले पर अलग-अलग पुरातन सभ्यता के प्रमाण मिल चुके हैं। इसके एक तरफ राखीगढ़ी तो दूसरी तरफ राखी शाहपुर गांव है। बारिश में मिट्टी दरक रही है। यह कभी भी ढह सकती है। इसके कारण आसपास बने मकानों को भी खतरा है।