नारनौंद। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के सबसे विशाल और सुनियोजित नगरों में शामिल राखीगढ़ी का करीब 7,000 साल पुराना इतिहास रविवार रात आकाशवाणी के माध्यम से देश-दुनिया के श्रोताओं तक पहुंचा।
ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित विशेष रेडियो रूपक ‘राखीगढ़ी : मिट्टी के नीचे सोया एक महानगर’ में प्राचीन नगरी की खोज, नगर नियोजन, वैज्ञानिक उपलब्धियों, डीएनए अनुसंधान और पुरातात्विक संभावनाओं को रोचक व तथ्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का आलेख और संपादन इतिहास अध्येता अप्पू सहारण ने किया। उन्होंने कहा कि यह प्रयास युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों, इतिहास और वैज्ञानिक विरासत को समझने के लिए प्रेरित करेगा।
रेडियो रूपक में प्रमुख पुरातत्वविदों और शोधकर्ताओं के विचार शामिल किए गए। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के प्रो. अमर सिंह ने राखीगढ़ी के शुरुआती उत्खनन से जुड़े अनुभव साझा किए। पुरातत्वविद डॉ. आरएस बिष्ट ने सरस्वती-दृषद्वती नदी तंत्र, क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, उर्वर कृषि भूमि और व्यापारिक संबंधों पर प्रकाश डाला।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मनोज सक्सेना ने ग्रिड पैटर्न पर बनी सड़कों और विकसित जल निकासी व्यवस्था की जानकारी दी। डेक्कन कॉलेज, पुणे के पूर्व कुलपति प्रो. वसंत शिंदे ने टीला नंबर सात से मिले प्राचीन मानव कंकालों के डीएनए विश्लेषण से जुड़े शोध पर चर्चा की। प्रो. पंकज गोयल ने प्राचीन पशुपालन और दूर-दराज के क्षेत्रों से व्यापारिक संबंधों के प्रमाणों की जानकारी दी।
संरक्षण और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा :
कार्यक्रम में एएसआई के महानिदेशक युद्धवीर रावत, हरियाणा पुरातत्व विभाग के उपनिदेशक डॉ. नरेंद्र परमार, युवा पुरातत्वविद् डॉ. दिशा अहलूवालिया, अंकित मलिक और स्थानीय ग्राम के पूर्व सरपंच दिनेश ने संरक्षण, यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की संभावनाओं, जीपीआर तकनीक और स्थानीय भागीदारी की जरूरत पर विचार रखे।