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29 गांवों में सहेजी जाएगी बरसात की बूंद-बूंद

Sat, 14 May 2016 02:02 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला , हिसार
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हार्वेस्टिंग - फोटो : buraeau
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पानी की किल्लत झेल रहे जिले के 29 गांवों में बरसात की बूंद-बूंद सहेजी जाएगी। इसके लिए इन गांवों में राजस्थान की तर्ज पर पानी के कुंड और हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाये जा रहे हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा बारिश के पानी को एकत्रित करने और भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए जिले के 29 गांवों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग टैंक व कुंड बनाए जा रहे हैं। कुंडों में बारिश का पानी एकत्रित किया जाएगा। जिसे पीने व रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल किया जा सकेगा।
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जानकारी के अनुसार मंत्रालय द्वारा 2010-11 में पानी की किल्लत झेल रहे गांवों का सर्वे कर जिले के 29 गांवों को सिलेक्ट किया गया था। अब प्रधानमंत्री ग्रामीण सिंचाई योजना के इंटीग्रेटेड वॉटर शेड मैनेजमेंट प्रोग्राम के तहत जिले के 29 गांवों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग टैंक व कुंड बनाए जा रहे हैं।

गांव की कमेटी कराएगी निर्माण
जिन गांवों मेें कुंड या हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाए जा रहे हैं। उन गांवों में वॉटर शेड कमेटी के नाम से एक कमेटी बनाई हुई है, जिसका प्रधान गांव का सरपंच बनाया गया है। इस कमेटी में गांव की महिलाएं तथा हर तबके के प्रतिनिधि होते हैं। कुंड या हार्वेस्टिंग सिस्टम कहां तथा कैसा बने यह निर्णय कमेटी द्वारा ही लिया जाता है। हालांकि सभी तकनीकी जानकारी अधिकारियों द्वारा दी गई है। गांव की इस कमेटी की देखरेख में ही ये कुंड या हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाए जा रहे हैं।
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डिमांड, जरूरत के हिसाब से बन रहे कुंड
इन 29 गांवों में लगाए जाने वाले कुंडों का साइज अलग-अलग है। गांव के लोगों की डिमांड और जरूरत के हिसाब से ही कुंड बनाए जा रहे हैं। किसी गांव में चार-चार कुंड बनाए जा रहे हैं तो किसी में एक ही कुंड बनाया गया है। छोटी साइज के कुंड की लागत कम से कम 90 हजार रुपये आती है।

ऐसे बनता है कुंड
जरूरत के मुताबिक क्षेत्र पर सीमेंट का पक्का फर्श बना दिया जाता है। उस पक्के क्षेत्र के बीच मेें एक बड़ा हौद बना कर उस पर लेंटर डाल दिया जाता है। पक्के किए गए क्षेत्र का ढलान हौद की और किया जाता है। ताकि पक्के फर्श पर गिरने वाला बारिश का पानी सीधा हौद में चला जाए। हौद से हैंडपंप को जोड़ दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर हैडपंप से पानी निकाल लिया जाता है।

यह होता है हार्वेस्टिंग सिस्टम
जमीन में एक बड़ा सा पक्का हौद बनाया जाता है। जिसमें एक निश्चित मात्रा में बजरी, रोड़े और ग्रेवल डाले जाते हैं। ताकि पानी इनके अंदर से गुजरे तो वह साफ हो जाए। हौद के बीच में एक पाइप को पाताल तक पहुंचा देते हैं। छतों आदि पर गिरने वाले बारिश के पानी को हौद में पहुंचाने के लिए पाइपों को हौद से जोड़ दिया जाता है। हौद में गिरा पानी साफ होकर पाइप के जरिए पाताल में पहुंच जाता है। भूमि में केवल साफ पानी को ही भेजा जाता है ताकि भूजल स्तर को बढ़ाया जा सके।

इन गांवों में निर्माण
रावतखेड़ा, चिड़ौद, बालसमंद, बालावास, बुड़ाक, दाहीमा, गुंज्यार, सलेमगढ़, धमाना, चौधरीवास, पनिहार, गोरछी मसूदपूर, डाटा, खारीया, किरतान आदि गांवों में कुंड या हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाए जा रहे हैं। जबकि कुछ गांवों में यह बन भी चुके हैं।
  90 हजार से लेकर पौने 5 लाख तक की कीमत से बन रहे हैं कुंड
गांवों में जरूरत के हिसाब से तीन अलग-अलग साइज के कुंड बनाए जा रहे हैं। जिनकी कीमत भी अलग-अलग है। सबसे कम 90 हजार रुपये में बनने वाला कुंड 4 मीटर गहरा और तीन मीटर गोलाई का होता है। इसके बाहर के फर्श की गोलाई छह मीटर होती है। इसके बाद दो लाख 83 हजार रुपये में बनने वाले कुंड की गहराई 3.2 मीटर और गोलाई पांच मीटर होती है। इसके बाहर के फर्श की गोलाई 9 मीटर होती है। सबसे बड़े कुंड को बनाने में 4.8 लाख रुपये खर्च होते हैं। इसकी गहराई साढ़े तीन मीटर और गोलाई 10 मीटर होती है। इसके बाहर के फर्श की गोलाई 13 मीटर होती है।

अब तक विभिन्न गांवों में करीब 12 से अधिक कुंड बनकर तैयार हो गए हैं। जबकि बाकी के गांवों में भी जल्दी ही कुंड तैयार कर लिये जाएंगे। कुंड बनने से बारिश के पानी को स्टॉक किया जा सकेगा, जिससे ग्रामीणों को पानी की समस्या से निजात मिलेगी।
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- डॉ. सत्यवान, एएससीओ, हिसार
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