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तीन साल से चौपाल के सहारे पांच गांवों की स्वास्थ्य सेवा

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सुरेंद्र दलाल
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हिसार। पांच गांवों की स्वास्थ्य सेवाएं पिछले तीन साल से चौपाल से चल रही हैं। सातरोड़ की पीएचसी में पहले डिलिवरी तक होती थी। अब स्टाफ व भवन की कमी के कारण यहां केवल इंजेक्शन देने तक का ही काम हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग के पास 4 एकड़ जमीन होने के बाद भी गांव में पीएचसी का भवन नहीं बनाया जा रहा। गांव के लोग इस बारे में कई बार मांग भी कर चुके हैं।
गांव सातरोड़ में जर्जर हो चुके पीएचसी भवन का उद्घाटन वर्ष 1983 में तत्कालीन सीएम भजनलाल ने किया था। सातरोड़ कलां के लोगों ने वर्ष 1983 में 4 एकड़ जमीन स्वास्थ्य विभाग को सौंप दी। जिसमें गांव के ही एक सेठ हरफूल के बच्चों ने यहां पीएचसी के भवन का निर्माण कराया। चार एकड़ में बने इस भवन के अलावा लंबा चौड़ा खुला एरिया भी छोड़ा गया था। पीएचसी में दस कमरे बनाए गए। यहां 10 बेड की व्यवस्था भी की गई। जिसमें पांच महिला तथा पांच पुरुष बेड आरक्षित किए गए। पीएचसी के चिकित्सकों के लिए आवासीय सुविधा भी दी गई, जिसमें चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ, फार्मासिस्ट के लिए क्वार्टर बनाए गए। उस समय अस्पताल में दो मेडिकल ऑफिसर, एक डेंटल सर्जन, दो स्टाफ नर्स, एक फार्मेसी ऑफिसर, लैब सहायक, एमपीएचडब्ल्यू के अलावा चतुर्थ श्रेणी कर्मी नियुक्त थे।
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हर माह तीन हजार ओपीडी थी
पीएचसी के रिकॉर्ड के अनुसार उस समय अस्पताल में हर महीने औसतन 3 हजार से अधिक की ओपीडी थी, जिसमें सातरोड़ कलां, सातरोड़ खुर्द, मय्यड, खरड़, अलीपुर, भगाना गांव के लोग दवा के लिए आते थे।
डिलवरी की सुविधा थी
सातरोड़ कलां की पीएचसी में 1983 में डिलवरी की सुविधा दी गई थी। आसपास के गांवों की महिलाएं भी यहां प्रसव कराने आती थीं। चिकित्सकों के आवास भी यहां थे। ऐसे में रात के समय भी मरीज यहां दवा लेने के लिए आते रहते थे।
सरकार कराए निर्माण
सातरोड़ निवासी विजेंद्र सातरोड़िया, अशोक पूनिया, रामेश्वर, राजेंद्र, छबीलदास, रतन इंदोरा, दलीप सिंह जांगड़ा, रतन सिंह बागड़ी, संजय टाक, रमेश खटक, कृष्ण शर्मा, सुनील पूनिया, रोहित पूनिया, मलखान, संदीप ने कहा कि प्रदेश सरकार जल्द से जल्द नए भवन का निर्माण कराए। जिससे 5 गांवों की स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हो सकें। कोरोना की तीसरी लहर का मुकाबला कर सकें।
2018 में कंडम घोषित हुआ था भवन
मैंने इस अस्पताल में 30 साल तक नौकरी की है। मेरी खुद की शादी इस परिसर में रहते हुए हुई थी। मेरे बेटे की शादी भी यहां हुई। मेरी यादें इस भवन से जुड़ी हैं। 2018 में इस भवन को कंडम घोषित किया था। उसके बाद से पीएचसी को गांव की चौपाल में चलाया जा रहा है।
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- नरेश कुमार, रिटायर्ड फार्मेसी ऑफिसर।
4 एकड़ जमीन दी हे
पीएचसी का भवन था उस समय यहां बहुत सुविधाएं थीं। अब भवन की कमी के कारण डिलिवरी की सुविधा बंद हो चुकी है। गांव के लोग इस बारे में कई बार मांग कर चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग को गांव ने 4 एकड़ जमीन दी हुई है। भवन बनाने का खर्च ही विभाग को करना है।
-कृष्ण सातरोड़, जिला पार्षद।
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