हिसार। खरीफ सीजन 2026 से पहले किसानों के लिए राहतभरी खबर है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) में आयोजित दो दिवसीय कृषि अधिकारी कार्यशाला में धान, मूंगफली और ज्वार की एक-एक नई किस्म और कपास की तीन किस्मों को अनुमोदित किया गया। साथ ही प्रदेश में मूंग का रकबा बढ़ाने के लिए किसानों को प्रेरित करने और ग्रीष्मकालीन मूंग की बिजाई मार्च के दूसरे पखवाड़े से अप्रैल के पहले पखवाड़े तक करने की सलाह दी गई।
विश्वविद्यालय के मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के सभागार में विस्तार शिक्षा निदेशालय की ओर से आयोजित कार्यशाला के समापन अवसर पर कुलपति प्रो. बलदेव राज काम्बोज ने बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए कहा कि कार्यशाला में तय सिफारिशों को किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जाए, ताकि आगामी खरीफ सीजन में उनका पूरा लाभ मिल सके। उन्होंने उन्नत कृषि तकनीकों, नवीनतम अनुसंधान उपलब्धियों, उन्नत बीज, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और फसल विविधीकरण को किसानों तक पहुंचाने में अधिकारियों की भूमिका पर जोर दिया।
उन्होंने फसल उत्पादन, उन्नत बीज प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, कीट व रोग नियंत्रण, जल संरक्षण तकनीक, कृषि मशीनीकरण तथा जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता बताई। कार्यशाला में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने शोध अनुभव साझा किए, जबकि कृषि विभाग के अधिकारियों ने फील्ड स्तर की समस्याओं और चुनौतियों से अवगत कराया।
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अतिरिक्त निदेशक डॉ. रामप्रताप सिहाग ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार किसानों के जोखिम कम करने के लिए अनेक योजनाएं चला रही हैं। उन्होंने किसान प्रशिक्षण, कृषि मेले और फील्ड डेमो आयोजित करने का सुझाव दिया। विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. रमेश कुमार यादव ने बताया कि कार्यशाला में छह सत्र आयोजित किए गए, जिनमें धान, मक्का, दलहनी फसलें, तिलहन, वानिकी, शुष्क खेती और चारा फसलों से संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।
दक्षिण-पश्चिम हरियाणा क्षेत्र में मूंग की अच्छी पैदावार के लिए विशेषज्ञों ने सलाह दी कि किसान 2 किलो पोटेशियम नाइट्रेट (13-0-45) को 200 लीटर पानी में घोलकर फूल निकलने और फलियां बनते समय दो बार छिड़काव करें।
कार्यशाला में 8 सिफारिशें स्वीकृत हुईं
1. एचकेआर-49 (धान): अर्ध-बौनी, जल्दी पकने वाली और अधिक पैदावार देने वाली किस्म। 120 दिन में तैयार, दाने लंबे-पतले (सुपरफाइन)। डीएसआर विधि में उपयुक्त। औसत पैदावार 32 क्विंटल/एकड़, अधिकतम 38 क्विंटल/एकड़।
2. जीएनएच-804 (मूंगफली): सिंचित क्षेत्र में समय पर बिजाई के लिए उपयुक्त सीधी व गुच्छेदार किस्म। औसत उपज 10–12 क्विंटल/एकड़, तेल मात्रा 52 प्रतिशत, अवधि 120–130 दिन।
3. सीएसवी-64एफ (चारा ज्वार): उत्तर भारत के चारा उत्पादक क्षेत्रों के लिए उपयुक्त। एक कटाई वाली मीठासयुक्त किस्म। हरे चारे की पैदावार 185–190 क्विंटल/एकड़।
4. आरसीएच-846 बीजी2 (कपास): बीटी संकर किस्म, समय पर बिजाई के लिए उपयुक्त। अवधि 150–160 दिन, औसत पैदावार 14.75 क्विंटल/एकड़।
5. आरसीएच-951 बीजी2 (कपास): बीटी संकर किस्म, अवधि 160–170 दिन। औसत पैदावार 15.7 क्विंटल/एकड़।
6. रघुवीर बीजी2 (कपास): बीटी संकर किस्म, अवधि 150–160 दिन। औसत पैदावार 14.13 क्विंटल/एकड़।