कोरोना काल की मजबूरी महिलाओं के सशक्तीकरण का आधार बन गया। नाती को खुश रखने के लिए महिला प्राचार्य द्वारा बनाए खिलौने लोगों को इस कदर पसंद आए कि उनकी मांग पूरी करने के लिए उन्होंने जरूरतमंद महिलाओं को प्रशिक्षण देना और उनसे खिलौने बनवाना शुरू कर दिया। अब किरण फाउंडेशन के तहत ये महिलाएं जींद, झज्जर, यमुनानगर, पंचकूला और चंडीगढ़ खिलौने बनाकर परिवार की आय बढ़ा रही हैं।
हिसार की साकेत कॉलोनी में रहने वाली संतोष मल्हान (64) बताती हैं कि क्रोशिया और ऊन से उनका पुराना रिश्ता है। जब वह छह साल की थीं उनकी दादी क्रोशिया से मेज पॉश, स्वेटर, उनके लिए जुराबें आदि बनाती थीं। उस समय शौक में दादी से उन्होंने यह कला सीखी और धीरे-धीरे निपुण हो गईं। शिक्षा विभाग से प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त होने पर घर में सारा दिन खाली बैठी रहती थी। इसी दौरान कोविड काल आया।
बेटी अपने 6 महीने के बेटे को लेकर घर पर आ गई। कोविड के समय घर से बाहर निकलना बंद था और घर पर खिलौने नहीं थे तो बेटी ने कहा कि मां क्रोशिया से ही कुछ खिलौने बना दो। उसके कहने पर क्रोशिया से ऊन के खिलौने बनाए। बेटी को वह खिलौने काफी पसंद आए। इसके बाद 6 महीने के अंदर पांच से छह खिलौने बना दिए। उन खिलौनों को बेटी अपने साथ ले गई। बेटी ने खिलौने अपनी सहेलियों को गिफ्ट में दे दिए। खिलौनों की मांग बढ़ी तो बनाने शुरू कर दिए।
फिर किसी ने फाउंडेशन बनाने की बात सुझाई। इसके बाद किरण फाउंडेशन बनाई और गांव-गांव जाकर लोगों को अपने साथ जोड़ा। अब करीब 100 महिलाएं संस्था से जुड़कर काम कर रही हैं। इस तकनीक से बने खिलौनों की कीमत 800 रुपये से लेकर 5000 रुपये तक के है। उन्होंने बताया कि वह महिलाओं को क्रोशिया से खूबसूरत खिलौने बनाना सिखाकर स्वरोजगार के लिए प्रेरित करती हैं। संवाद
मैडम पागली हो रही सै, क्यों आंख फूड़ाव सै
संतोष मल्हान ने बताया कि जब क्रोशिया का इस्तेमाल करती थी तो लोग कहते थे कि मैडल पागल हो रही सै, क्यों आंख फूड़ाव सै। ये सुनकर काफी बुरा लगता था, लेकिन एक कलाकार के अंदर कुछ कर गुजरने का पागलपन होता है। इसी से लोगों की बातों को अनसुना कर लुप्त होती कला को जिंदा करने के लिए कदम आगे बढ़ते रहे।
लंदन से आती है रूई
महिलाओं को रोजगार देने के लिए किरण फाउंडेशन बनाई है। शहर के अलावा जींद, झज्जर, यमुनानगर, पंचकूला और चंडीगढ़ में फाउंडेशन का काम कर रही है। जरूरतमंद महिलाओं को क्रोशिया के जरिये खिलौना बनाना सिखाते हैं। अभी तक 100 महिलाओं और युवतियाें को कला सीखा चुके हैं। इनमें से 70 महिलाएं खिलौने बनाकर अपने परिवार की आय बढ़ाने में कामयाब रही हैं। खिलौने बनाने के लिए लंदन से रूई मंगवाई जाती है। इस रूई को ऑर्गेनिक रंग से रंगा जाता है। इस रूई से बन कर तैयार खिलौने की कीमत 800 रुपये से 5 हजार तक है और ये ईको फ्रैंडली है। इससे बच्चों के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता, जबकि प्लास्टिक के खिलौने बच्चों के स्वास्थ्य पर असर डालते हैं।