हिसार। वर्तमान दौर में सामाजिक ताने-बाने के बिखरते धागे, बुढ़ापे में औलाद से सहारे की उम्मीद रखने वाले माता-पिता को सबसे अधिक दर्द दे रहे हैं। मोक्ष वृद्धाश्रम में रह रहे अधिकतर बुजुर्ग अपनों के ही दिए गम को सीने पर लेकर दिन काट रहे हैं। आश्रम के अलावा इनका कोई सहारा नहीं है। किसी को बेटे-बहू तो किसी को पत्नी इस आश्रम के हवाले कर हमेशा के लिए मुंह मोड़ चुके हैं।
हरिद्वार के आश्रम में पली-बढ़ीं लक्ष्मी (48) की कहानी भी कुछ ऐसी है। लक्ष्मी उस दिन को नहीं भूल पा रही जब पति के निधन के बाद बेटों ने उसे घर से निकाल दिया। वह बतातीं हैं कि पति के साथ खुशी-खुशी जीवन बिता रही थीं, लेकिन परिस्थितियों ने आज वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर कर दिया है। मेरी शादी देहरादून में हुई थी, जहां पति पंडिताई का काम करते थे। परिवार का गुजारा अच्छे से चल रहा था। शादी के बाद दो बेटे हुए। उन्हें पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाया। इसी बीच 2008 में पति का निधन हो गया। इसके बाद से जीवन में दुविधाओं का दौर शुरू हो गया। वह दोनों बेटों के साथ जयपुर चली आईं, जहां बड़े बेटे की शादी कर दी।कुछ दिन ठीक से परिवार चला, लेकिन बाद में बहू ने तंग करना शुरू कर दिया। भरपेट खाना देना बंद कर दिया। घर से बाहर जाने की भी अनुमति नहीं दी जाती थी। हर रोज कलह होती थी। आखिर बेटे ने बहू के कहने पर घर से निकाल दिया और मोक्ष वृद्धाश्रम में छोड़ गए। अब दोनों बेटे जयपुर में रहते हैं, लेकिन उसे कोई याद नहीं करता। अब जीवन के अंतिम क्षण तक आश्रम ही मेरा ठिकाना है।
-
लक्ष्मी 2022 में आश्रम में रहने आई थी। वह कुपोषण की शिकार लग रही थी। यहां देखरेख के बाद से अब स्वस्थ है। उनके दोनों बेटों ने आज तक कोई फोन नहीं किया हैं। लक्ष्मी की बहनों का भी उससे कोई वास्ता नहीं रहा। -
विजय भृगु, आश्रम संचालक।