फूलों का रस लेकर शहद बनाने वाली मधुमक्खियों का जीवन भी पराली जलाने के चलते खतरे में आ गया है। मैदानी इलाकों में बागीचों, पेड़-पौधों पर अक्तूबर-नवंबर में ये अपनी कॉलोनी बनाती हैं और उसी वक्त पराली जलाने की घटनाएं हो रही हैं। आग और धुएं के प्रति बेहद संवेदनशील मधुमक्खियां इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं। इससे उनका प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होने लगा है। इसका असर आने वाले दिनों में सरसों की फसल के उत्पादन पर पड़ेगा। इसके अलावा फलों व सब्जियों का उत्पादन भी इससे प्रभावित हो जाएगा।
हरियाणा में चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय हिसार से जुड़े कृषि विज्ञान केंद्र सदलपुर के कोआर्डिनेटर डॉ. नरेंद्र बताते हैं कि मधुमक्खियां 30 से 35 डिग्री तापमान में ही रहती हैं। इस लिहाज से अक्तूबर-नवंबर इनकी कॉलोनी विकसित करने का सबसे सही समय होता है। उस वक्त मौसम में नमी भी रहती है। अक्तूबर में ही हरियाणा में सरसों की खेती होती है।
नवंबर में सरसों में फूल आ जाते हैं, जिससे मधुमक्खियों को भोजन आसानी से मिलने लगता है। इसलिए अपने क्षेत्र में अक्तूबर-नवंबर में प्राकृतिक रूप से मधुमक्खियां बागों, ऊंचे पेड़ों से लेकर छोटी झाड़ियों तक में अपनी कॉलोनी (छत्ते) बनाना शुरू कर देती हैं।
पिछले कुछ वर्षों से दशहरा व दीपावली के बीच धान की कटाई के बाद पराली जलाने की घटनाएं भी होने लगी हैं। इससे मधुमक्खियों का जीवन सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है। क्योंकि अत्यधिक धुएं की वजह से अधिकांश मधुमक्खियां बेहोश हो जाती हैं या मर भी जाती हैं।
जो किसान इन्हें डिब्बे में पालते हैं, वहां भी धुएं व गर्मी की वजह से ये अपने भोजन की तलाश में बाहर नहीं निकलतीं। इसका असर यह हुआ है कि पहले बगीचों में सामान्य तौर पर दिखने वाली मधुमक्खियों की कॉलोनी (छत्ता) अब काफी कम दिख रही है। अगर समय रहते, इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसका असर खेती पर ही पड़ेगा।
धुएं की वजह से बाग में नहीं हो रहा परागण
हिसार जिले के गांव किशनगढ़ में एक किसान के बेर व किन्नू के बाग में दो साल से फल बहुत ही कम मात्रा में लग रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र सदलपुर के वैज्ञानिकों ने इसका परीक्षण किया तो पता लगा कि धुएं की वजह से मधुमक्खियां बाग की तरफ आ ही नहीं रही हैं। इससे बेर व किन्नू के फूलों में परागण की प्रक्रिया प्रभावित हो गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि परागण के चलते ही फूल से फल बनता है। परागण की प्रक्रिया हवा के माध्यम से भी होती है, लेकिन मधुमक्खियों के जरिए होने वाली प्रक्रिया सबसे अच्छी होती है।
सरसों व सब्जियों के उत्पादन पर पड़ेगा असर
कृषि वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र बताते हैं कि मधुमक्खियों का सबसे अधिक असर सरसों की खेती पर होता है। अनुकूल तापमान और पर्याप्त मात्रा में भोजन मिलने के चलते इनका सरसों के खेत से विशेष मोह होता है। लेकिन प्राकृतिक आवास प्रभावित होने के चलते सरसों के फूलों पर मधुमक्खियों की संख्या कम पहुंच रही है, जिससे परागण की प्रक्रिया सुस्त हो गई है। इससे सरसों की उपज में 10 से लेकर 20 प्रतिशत तक असर पड़ेगा। इसके अलावा बेल वाली सब्जियों पर भी इसका असर होगा।
पराली न जलाएं, कीटनाशकों का प्रयोग बंद करें
डॉ. नरेंद्र बताते हैं कि पराली जलाने से निकलने वाला धुआं व आग मधुमक्खियों को प्रभावित कर रहा है। इसके अलावा फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए फूलों पर किए जा रहे कीटनाशकों के प्रयोग से भी मधुमक्खियों का जीवन प्रभावित होता है। अगर किसी खेत में जहरीले कीटनाशक का छिड़काव हुआ है और उससे मधुमक्खियों ने रस चूसा है, तो उससे उनके साथ कॉलोनी की अन्य मधुमक्खियां भी मर जाती हैं। इसलिए किसानों को कैंप के माध्यम से इसकी जानकारी दी जा रही है। किसानों से अनुरोध किया जा रहा है कि किसी भी हाल में पराली न जलाएं।