हिसार। लगातार मौसम परिवर्तन के चलते गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग लगने की आशंका है। दिसंबर माह के आखिरी सप्ताह से मार्च तक यह रोग गेहूं की फसल में अधिक लगता है। किसान पीला रतुआ के लक्षण दिखने पर तुरंत कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क कर प्रमाणित दवाइयों का स्प्रे करें। यह सलाह चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कुलपति प्रो. बीआर कांबोज ने दी।
उन्होंने किसानों को आगाह करते हुए कहा कि मौजूदा समय में तापमान में गिरावट के चलते गेहूं की फसल में रतुआ रोग लगने की आशंका है। ऐसे में किसान सावधानी बरतें और वैज्ञानिक सलाह से इस पर काबू पाएं अन्यथा पैदावार में गिरावट आ सकती है।
उन्होंने सलाह दी कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की सिफारिशों को ध्यान में रखकर फफूंद नाशक का प्रयोग करें। उन्होंने बताया कि यह रोग मुख्यत: अंबाला व यमुनानगर में अधिक देखा गया है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से इसका असर पूरे हरियाणा में दिख रहा है।
पीला रतुआ-पोषक तत्वों की कमी के अंतर को पहचानें किसान
अनुवांशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के गेहूं व जौ अनुभाग अध्यक्ष डॉ. पवन कुमार ने बताया कि कई बार किसान गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग और पोषक तत्वों की कमी के अंतर को पहचान नहीं पाते हैं। ऐसे में किसान बिना वैज्ञानिक सलाह और जांच के दवाइयों का इस्तेमाल करने लगते हैं।
इससे किसानों को आर्थिक नुकसान होने की आशंका रहती है। उन्होंने बताया कि पीला रतुआ रोग में पत्तों पर पीले या संतरी रंग की धारियां नजर आने लगती हैं। रतुआ रोग ग्रस्त पत्तों को अंगुली व अंगूठे के बीच में रगड़ने पर फफूंद के कण अंगुली या अंगूठे में चिपक जाते हैं और हल्दीनुमा नजर आते हैं। हालांकि पोषक तत्वों की कमी होने पर ऐसा नहीं होता है।
ऐसे करें उपचार
पादप रोग वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र सिंह बेनीवाल के अनुसार, खेत में पीला रतुआ के लक्षण नजर आने पर प्रोपकोनाजोल 200 मिलीलीटर 200 लीटर पानी में मिलाकर तुरंत छिड़काव करें। यदि बीमारी ज्यादा फैल रही है तो दोबारा छिड़काव कर दें। यह बीमारी एच डी 2967, एच डी 2851, डब्ल्यू एच 711 किस्मों में अधिक आने की संभावना रहती है। इन किस्मों की बिजाई करने वाले किसान विशेष ध्यान रखें। भविष्य मेें बिजाई के लिए रोगरोधी किस्मों को ही प्राथमिकता दें।