हिसार। देश मेें अफ्रीकन स्वाइन फीवर का पहला केस मिला है। ऐसे में हरियाणा में भी सूअर पालकों को सावधान रहने की जरूरत है। लाला लाजपत राय पशु विज्ञान एवं पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय (लुवास) के पशु चिकित्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य और पशु महामारी विज्ञान विभाग के वरिष्ठ रोग जांच अधिकारी डॉ. नरेश जिंदल ने बताया कि हरियाणा में सूअरों की संख्या लगभग 60 से 70 हजार है। उन्होंने कहा कि यह बीमारी कहीं भी और किसी भी सूअर को हो सकती है। ऐसे में सावधानी रखने की आवश्यकता है। हालांकि गांवों में रखे जाने वाले काले रंग के सूअरों को इसका बहुत अधिक खतरा इसलिए नहीं है, क्योंकि इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी अधिक होती है। हालांकि फार्म में पाले जाने वाले सूअरों को इस बीमारी से अधिक खतरा है।
दो तरह का होता है स्वाइन फीवर
डॉ. जिंदल ने बताया कि सूअर में क्लासिकल स्वाइन फीवर और अफ्रीकन स्वाइन फीवर दो तरह की बीमारियां होती हैं। इनके लक्षण एक जैसे होने के कारण कौन सा फीवर है, इसका आरंभ में पता नहीं लगता। लेकिन दोनों बीमारियों के विषाणु अलग-अलग होते हैं। दोनों बीमारियों के लक्षण सूअर को तेज बुखार, लड़खड़ा कर चलना, सफेद सूअर के शरीर पर नीले चकते होना, सुस्ती, खाना-पीना छोड़ना आदि हैं।
इंसानों और अन्य पशुओं को खतरा नहीं
डॉ. राकेश जिंदल के अनुसार सूअर में होने वाली यह बीमारी किसी भी इंसान व अन्य जानवर में आज तक नहीं मिली है, लेकिन यह इंसानों के जरिए एक से दूसरे सुअर में फैल जरूर सकती है। जब इंसान सूअर फार्म पर सुअरों की देखभाल करता है तो वह हाथों या अन्य चीजों से दूसरे सूअर में भी यह बीमारी पहुंचा देता है। ऐसे में सुअर पालकों को सावधानी बरतने की जरूरत है।
ये सावधानियां जरूरी
- फार्म की साफ-सफाई रखें।
- सूअर की मृत्यु पर पशु रोग अधिकारियों को सूचना दें, डिस्पोजल बेहतर तरीके से करें।
- पालक एक-दूसरे के फार्म पर आना-जाना बंद कर दें।
- सूअरों की खरीद-फरोख्त या मिक्सिंग बंद कर दें।
सूअरों के लिए खतरनाक है यह विषाणु
डॉ. जिंदल के अनुसार दुनिया में पिछले चार वर्षों की बात करें तो यह बीमारी कई अलग-अलग देशों में आई है। भारत में यह कैसे पहुंची, इसका पता लगने में समय लगेगा। इसमें संभवत 3 महीने से अधिक का टाइम लग जाएगा। उन्होंने कहा कि यह सूअर के लिए बहुत खतरनाक विषाणु है।