हिसार। देवा हो देवा गणपति देवा, अगले बरस तू जल्दी आ के साथ शनिवार को गणपति बप्पा को विदाई दी। सुबह से ही सड़कों पर श्रद्धालुओं का जन सैलाब उमड़ा रहा। डीजे की धुन पर श्रद्धालु नाचते और गुलाल उडाते हुए विसर्जन के लिए सातरोड नहर पहुंचे। यहां विदाई से पहले गणपति को लड्डूओं का भोग लगाया और सेल्फी ली गई। श्रद्धालुओं ने गुलाल के साथ होली खेली। बीच रास्ते में खूब पटाखे फोड़े।
दोपहर बाद विसर्जन के लिए सातरोड नहर पर श्रद्धालुओं की भीड़ लगनी शुरू हो गई। शनिवार को कैंट, कुंजलाल गार्डन, जवाहर नगर, सातरोड, मय्यड़, डोगरान मोहल्ला, महाबीर कॉलोनी, शांति नगर, अग्रसैन कॉलोनी, नवदीप कॉलोनी, ऋषि नगर, महता नगर सहित अन्य जगह से विसर्जन के लिए पहुंचें। इससे पहले घरों में गणपति की पूजा-अर्चना चलती रही। मंदिर में भी भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने के बाद श्रद्धालुओं को लड्डूओं और मोदक का प्रसाद वितरित किया गया। मंदिरों को सजाया गया था।
झांकियों को मोबाइल में किया कैद
गणपति और अघोरी की झांकियां लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रही। लोगों ने झांकियाें को मोबाइल में कैद किया। शनिवार को विसर्जन का अंतिम दिन था। इस दिन विसर्जन के लिए सबसे ज्यादा नहर पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही। विदाई से पहले बप्पा की आरती उतारी गई। श्रद्धालुओं ने बप्पा के कान में मन्नत मांगी। वहीं, देर शाम तक विसर्जन का दौर चलता रहा।
-
जाम में फंसे रहे लोग
शनिवार को अंतिम दिन जगह-जगह से श्रद्धालु विसर्जन के लिए पहुंचें हुए थे। इस दौरान दिल्ली रोड पर जाम की स्थिति बनी रही। जिंदल पुल पर भी काफी देर तक लोग जाम में फंसे रहे। वहीं, नहर से कुछ दूर पहले भी वाहनों की लंबी कतार लगी हुई थी। ऐसे में लोगों को आने-जाने में परेशानी उठानी पड़ी।
-
आज से श्राद्ध शुरू, 21 तक चलेंगे
श्राद्ध रविवार से शुरू होने जा रहे है। जोकि 21 सितंबर तक रहेंगे। श्राद्ध के दिन केवल अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि स्मृतियों और भावनाओं का पुल है, जो वर्तमान को अतीत से जोड़ता है। कैलाश पंचांग के निर्माता पंडित देव शर्मा ने बताया कि शास्त्रों में वर्णित है कि पितृदेव हमारे अदृश्य संरक्षक हैं। इस अवधि में श्रद्धा भाव से किए गए कर्मकांड से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और वे आशीर्वाद स्वरूप परिवार पर सुख-समृद्धि, आयु और उन्नति का वरदान प्रदान करते हैं। जब पूर्वज प्रसन्न होते हैं तो वंशजों के जीवन में समृद्धि, शांति और प्रगति का मार्ग खुलता है। माना जाता है कि पितरों का आशीर्वाद ही देवताओं की कृपा प्राप्त करने का माध्यम है।
-
श्राद्ध की तारीख
पूर्णिमा का श्राद्ध 7 सितंबर
प्रतिपदी का श्राद्ध 8 सितंबर
द्वितीया का श्राद्ध 9 सितंबर
तृतीया का श्राद्ध 10 सितंबर
12:46 तक चतुर्थी का श्राद्ध 11 सितंबर
12:46 के बाद पंचमी का श्राद्ध 11 सितंबर
9:59 के बाद षष्ठी का श्राद्ध 12 सितंबर
7:24 के बाद सप्तमी का श्राद्ध 13 सितंबर
अष्टमी का श्राद्ध 14 सितंबर
अष्टमी का श्राद्ध 14 सितंबर
नवमी का श्राद्ध 15 सितंबर
दशमी का श्राद्ध 16 सितंबर
एकादशी का श्राद्ध 17 सितंबर
द्वादशी का श्राद्ध 18 सितंबर
त्रयोदशी का श्राद्ध 19 सितंबर
चतुर्दशी का श्राद्ध 20 सितंबर
अमावस का श्राद्ध 21 सितंबर