हिसार से लगभग 65 किमी दूरी पर स्थित राखीगढ़ी की साइट की छठी बार खोदाई इसी महीने के आखिरी हफ्ते में शुरू होने की संभावना है। विश्व के सबसे बड़े हड़प्पाकालीन स्थलों में शुमार यह स्थल अब भी आबाद है। भारतीय पुरातत्व विभाग के संयुक्त महानिदेशक संजय मंजुल का कहना है कि वह अपनी टीम के साथ एक हफ्ते राखीगढ़ी आएंगे। वहां की स्थिति का आकलन करने के बाद खोदाई शुरू करने की तारीख तय करेंगे। पिछली बार लेडार के जरिये मिली जानकारी का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है।
पुरातत्व विभाग चंडीगढ़ कुनाल की सातवीं बार खोदाई करेगा। फतेहाबाद की रतिया तहसील से 12 किमी की दूरी पर स्थित कुनाल सबसे पुरानी पूर्व-हड़प्पा बस्तियों में से एक है और लगभग 5वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व की है। यहां पर हड़प्पा पूर्व, हड़प्पा व वैदिक काल तक के अवशेष मिले हैं। यह साइट लगभग 6,000 साल पुरानी बताई जाती है। इतिहासकारों के अनुसार उस जमाने में यहां से सरस्वती नदी का प्रवाह होता था और तब यहां पर बस्ती बसाई गई थी।
विभाग के मुताबिक पुरातात्विक स्थलों की खोदाई में लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग (लेडार) तकनीक की मदद ली जाएगी। लेजर किरणों और सैटेलाइट के समन्वय से चलने वाली इस डिवाइस को गड्ढा खोदकर रखा जाता है। यह उपकरण लेजर किरणें फेंकता है और इसमें लगे कैमरे चारों ओर धूमते हैं, जिससे किसी भी पुरावशेष की थ्री डायमेंशनल तस्वीरें मिलती हैं। इतिहासकार डॉ. महेंद्र सिंह बताते हैं कि राखीगढ़ी में सबसे पहले वर्ष 2022 में खोदाई के दौरान इस तकनीक का उपयोग किया गया था। तब धरती के 10 मीटर अंदर की वस्तुओं के बारे में जानकारी ली गई थी। अब खोदाई के दौरान उन्नत लेडार का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे 20 मीटर गहराई तक की तस्वीर ली जा सकेगी।
कुनाल में दिवाली के बाद फिर खोदाई शुरू होगी। लेडार तकनीक से पुरावशेष के आकार-प्रकार और उसकी स्थिति जानने में आसानी होती है। इससे पुरावशेष को क्षति भी नहीं पहुंचती है। तथ्यों के विश्लेषण में आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। -डॉ. बनानी भट्टाचार्य, उपनिदेशक, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग।